अकेले हरदा को पता है वीआईपी का नाम!

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तभी तो न्याय पालिका, सरकार, विधानसभा, पुलिस पर पूर्व मुख्यमंत्री को नहीं है भरोसा?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में अपनी राजनीतिक जमीन फिसलते देख राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री पिछले कुछ समय से अचानक अंकिता हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने और हत्याकांड में वीआईपी का नाम उजागर करने को लेकर धरना और कैंडल मार्च निकालकर यह साबित करने के मिशन में लगे हुये हैं कि हत्याकांड मंे एक वीआईपी भी शामिल है जिसका नाम उजागर नहीं किया जा रहा है? सवाल यह है कि क्या अकेले हरदा को पता है अंकिता हत्याकांड में वीआईपी का नाम? वीआईपी के नाम के खुलासे को लेकर जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री अखबार और चैनलों में अपने आपको बने रहने के लिए आये दिन प्रेशर पॉलीटिक्स का खेल खेल रहे हैं उससे सवाल खडे हो रहे हैं कि क्या अपने आपको राजनीति में बनाये रखने के लिए वह न्याय पालिका, सरकार, विधानसभा और पुलिस पर भरोसा नहीं कर रहे हैं? सवाल यह भी है कि अगर हरदा को अंकिता भंडारी हत्याकांड में वीआईपी के नाम का पता है तो फिर वह मीडिया के सामने उस वीआईपी को बेनकाब करने के लिए आगे नहीं आ रहे यह हैरान करने जैसा ही दिखाई दे रहा है?
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड में जब अंकिता भण्डारी हत्याकांड सामने आया तो उसके बाद राज्य के अन्दर चारो ओर हत्यारों को दबोचने और उनके गुनाहगारों को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए धरने, प्रदर्शन शुरू हुये। आवाम के मन में इस बात को लेकर बेहद गुस्सा था कि जिस तरह से अंकिता को मौत दी गई वह उत्तराखण्ड के लिए काफी चिंता का विषय है। इस हत्याकांड की गूंज से समूचा उत्तराखण्ड जलने लगा तो राज्य के मुुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सख्त रूख अपनाते हुए इस हत्याकांड की जांच एसआईटी के हवाले की और गुनाहगारों को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए उन्होंने अपना संकल्प लिया। मुख्यमंत्री ने इस हत्याकांड की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने का भी आदेश दिया जिसके बाद से एसआईटी ने अपनी जांच को बारीकी से शुरू किया और अपनी जांच को पूरी कर उन्हें इस पूरे हत्याकांड की चार्जशीट न्यायालय में दाखिल की और हत्याकांड में गुनाह करने वालों को बडी सजा दिलाने के लिए सौ गवाहों को भी तैयार किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य के अन्दर साफ ऐलान किया था कि अगर इस हत्याकांड में उन्हें सीबीआई जांच कराने के लिए भी आगे आना पडा तो वह सीबीआई जांच कराने से पीछे नहीं हटेंगे। एसआईटी की जांच से सरकार भी संतुष्ट नजर आई और इसी बीच अंकिता के परिजनों ने नैनीताल उच्च न्यायालय में हत्याकांड की सीबीआई से जांच कराने के लिए याचिका दाखिल की थी जिस पर न्यायालय ने लम्बी सुनवाई के बाद हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने को लेकर इंकार कर दिया था और अपने आदेश में कहा कि एसआईटी की जांच सही दिशा में है। इतना ही नहीं यह मामला जब विधानसभा में गूंजा तो विधानसभा के पटल पर सरकार की ओर से यह कहा गया कि हत्याकांड में कोई वीआईपी शामिल नहीं है बल्कि रिजॉट में वीआईपी सूट को ही वीआईपी रूम कहा जाता है। विधानसभा में साफ हो गया कि इस हत्याकांड में कोई वीआईपी नहीं है। हैरानी वाली बात है कि अंकिता हत्याकांड में उच्च न्यायालय ने एसआईटी की जांच को सही दिशा में पाया लेकिन राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत उत्तराखण्ड के पहले ऐसे राजनेता दिखाई दे रहे हैं जिन्हें शायद इस हत्याकांड में वीआईपी का नाम पता है? इसी के चलते वह कभी गांधी पार्क के बाहर धरना दे रहे हैं तो कभी उन्होंने कैंडल मार्च निकालकर वीआईपी के नाम के खुलासे को लेकर अपनी हुंकार लगा रहे हैं? हालांकि राजधानी में यह बहस चल रही है कि अगर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को अंकिता भण्डारी हत्याकांड में वीआईपी का नाम पता तो फिर वह मीडिया के सामने उस वीआईपी का नाम उजागर कर उसे बेनकाब करने के लिए क्यों आगे नहीं आ रहे हैं? पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अंकिता भण्डारी हत्याकांड में वीआईपी के नाम के सहारे अखबार के कॉलमों और चैनल के फुटेज मे ंजिस तरह से अपनी राजनीति को चमका रहे हैं उससे तो यही आभास हो रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री को न्यायालय से लेकर सरकार पर कोई भरोसा ही नहीं है जिसके चलते वह आये दिन अंकिता भण्डारी हत्याकांड में वीआईपी के नाम के खुलासे को लेकर इस मामले को हवा दे रहे हैं?

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