जनजाति प्रमाण पत्रों से मिली सरकारी नौकरियां?
तो क्या सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार के आदेश की उड़ रही धज्जियां
विकेश नेगी की हुंकारः फर्जी जाति प्रमाण पत्रों से अफसर भी कर रहे नौकरियां
सरकार समयबद्ध कार्यवाही नहीं करती तो मामले को न्यायालय और राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जायेगा
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार का अंत करने के लिए मुख्यमंत्री ने एक बडा संकल्प ले रखा है और दो टूक कह रखा है कि राज्य के अन्दर भ्रष्टाचार करने वाले किसी भी किसी भी भ्रष्टाचारी को बक्शा नहीं जायेगा। वहीं एक अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता ने हुंकार लगाई है कि भ्रष्टाचार से घातक है कि बडी संख्या में राज्य के अन्दर जनजाति प्रमाण पत्रों से सरकारी नौकरियां मिली हुई हैं जिससे सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार के आदेश की खुली धज्जियां उडाई जा रही हैं। विकेश का साफ कहना है कि राज्य के अन्दर बडी संख्या मंे फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के आधार पर जिन्होंने सरकारी नौकरियां हासिल कर रखी है वह शुद्ध अवैध हैं और इसी के लिए उन्होंने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर मांग की है कि अपात्र जन जाति प्रमाण पत्रों की हाईलेवल जांच कराई जाये और उन सबको नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाया जाये जिन्होंने फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के आधार पर सरकारी नौकरियां ले रखी हैं और जो इसकी आड में छात्रवृत्तियां मुआवजा लेते आ रहे हैं। जनजाति प्रमाण पत्रों का लाभ लेकर जो कर्मचारी और अधिकारी सरकारी नौकरियांे में एक दशक से डटे हुये हैं और अगर उनके प्रमाण पत्र ही फर्जी हैं तो यह एक बहुत बडा भ्रष्टाचार का खतरनाक खेल है और इस खेल को बेनकाब करने के लिए क्या मुख्यमंत्री एक बडा मास्टर स्ट्रोक चलते हुए इसको लेकर उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन करने का आदेश देंगे इस पर अब सबकी नजरें लग गई हैं।
अधिवक्ता एंव सामाजिक कार्यकर्ता विकेश नेगी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कहा है कि अनुच्छेद 342 के अन्तर्गत अनुसूचित जनजातियों की सूची राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित होती है और उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन, संशोधन, जोडना या हटाना केवल संसद द्वारा बनाये गये कानून से ही संभव है। उन्होंने कहा कि किसी राज्य सरकार, अधिकारी, न्यायालय, आयोग या अन्य प्राधिकरण को यह अधिकार प्राप्त नहीं है। विकेश नेगी की खुली हुंकार है कि यदि उत्तराखण्ड में अपात्र व्यक्तियों को एसटी प्रमाण पत्र जारी किये गये और उनके आधार पर सरकारी नौकरियां, पदोन्नति, छात्र-वृत्तियां, मुआवजा, आरक्षण, भूमि आवंटन, चुनावी लाभ अथवा सरकारी सुविधायें प्राप्त की गई हैं, तो उन सभी मामलों की व्यापक बडी जांच आवश्यक है। विकेश नेगी का खुला आरोप है कि देहरादून जनपद के विकासनगर, कालसी, त्यूणी, चकराता तथा अन्य क्षेत्रों में वर्षों से गलत व्याख्या के आधार पर एसटी प्रमाण पत्र जारी किये जा रहे हैं, जिससे वास्तविक जनजातीय समुदाय के संवैधानिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
मुख्य सचिव को लिखे पत्र में विकेश नेगी ने यह भी अंकित किया है कि 28 नवम्बर 2000 से वर्तमान तक जारी सभी विवादित एसटी प्रमाण पत्रों की राजव्यापी जांच कराई जाये और अपात्र व्यक्तियों के सभी एसटी प्रमाण पत्र तत्काल निरस्त किये जायें। ऐसे प्रमाण पत्रों के आधार पर प्राप्त सरकारी नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों, मुआवजों और अन्य लाभों की समीक्षा की जाये और गलत प्रमाण पत्र जारी करने वाले अधिकारियों के विरूद्व विभागीय, दण्डात्मक एवं अपराधिक कार्यवाही की जाये। विकेश नेगी ने यह हुंकार भी लगाई है कि सरकार समयबद्ध कार्यवाही नहीं करती तो वह इस मामले को न्यायालय और राष्ट्रीय स्तर पर उठायेंगे। विकेश का कहना है कि उत्तराखण्ड में कोई भी जनजातीय क्षेत्र नहीं है और राज्य के एक मुख्यमंत्री ने इस मामले को लेकर भारत सरकार को भी पत्र लिखा था जिसे भारत सरकार ने रिजेक्ट कर दिया था।