सट्टे से निकलता है अपराध का ‘द्वार’

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नशे से सौ गुना घातक है ‘सट्टे का चस्का’
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड सरकार व पुलिस मुखिया नशे के बढते काले कारोबार पर नकेल लगाने के लिए सेमिनार और नुक्कड सभायें कर युवा पीढी को नशे के दलदल से बचाने के लिए पूरी ताकत झोंके हुये हैं क्योंकि उन्हें इस बात का इल्म है कि अगर युवा पीढी भी नशे के दलदल में धसकर बर्बाद हो गई तो फिर राज्य का भविष्य अंधकारमय आ जायेगा? पुलिस के बडे अफसर नशा रोकने के लिए तो आये दिन बडे-बडे प्लान के तहत आगे आ रहे हैं लेकिन सट्टे के नशे में डूबकर युवा पीढी कब अपराध के द्वार की तरफ अपने कदम आगे बढा ले यह एक बडा सवाल राजधानी में तो खडा हुआ दिखाई दे रहा है जहां अपराध रूकने का नाम नहीं ले रहे हैं? राजधानी में इस बात को लेकर भी चिंता का दौर है कि नशे से सौ गुना घातक सट्टे का चस्का है? अगर युवा पीढी व काफी व्यापारी इस चस्के की चाश्नी में डूबने लगे तो उन्हें बर्बादी के द्वार से वापस लाना सरकार और सिस्टम के हाथ में भी नहीं होगा इसलिए सरकार को चाहिए कि वह नशे से ज्यादा सट्टे के सिंडिकेट पर बडा प्रहार करे और उनके द्वारा बर्बाद किये जा रहे परिवारों को बचाने के लिए सट्टेबाजों के सिंडिकेट पर गैंगेस्टर, उनकी हिस्ट्रीशीट खोलने के साथ ही उनकी गैर कानूनी तरीके से कमाई गई सम्पत्तियों को सील कर देना चाहिए तभी राजधानी में सट्टे के धंधे पर लगाम लग पायेगी?
उल्लेखनीय है कि सरकार के मुखिया पुष्कर सिंह धामी उत्तराखण्ड को हर अपराध से मुक्त करने का संकल्प ले चुके हैं और वह चाहते है कि उनके उत्तराखण्ड की जवानी किसी भी ऐसे चस्के का शिकार न हो जाये जिससे उन्हें अपना जीवन सुरक्षित रखने में संकट आ खडा हो? यही कारण है कि राज्य के मुख्यमंत्री ने उत्तराखण्ड को नशामुक्त बनाने की दिशा में बडी पहल कर रखी है और नशे पर प्रहार करने के लिए उन्होंने एक टास्क फोर्स का भी गठन किया है जिससे एक उम्मीद जग गई है कि राज्य में अब नशा माफियों पर बडा प्रहार होगा और उनके चंुगल से युवा पीढी को बचाया जायेगा। राजधानी के अन्दर यह बहस भी छिड गई है कि नशा करने वाला तो एक ही इंसान होता है और उसका नशा इतना कीमती भी नहीं होता कि वह अपने परिवार को अपने नशे के इस चस्के से उन्हें बर्बादी के द्वार पर लाकर खडा कर दे लेकिन राजधानी में सट्टेबाजों का एक लम्बाचौडा सिंडिकेट नशे से भी सौ गुना घातक क्रिकेट और मटका सट्टा खिलाकर परिवारों को बर्बाद करने के तांडव में जुटा हुआ है और इस गैर कानूनी धंधे को करने वाले चेहरों को सलाखों के पीछे पहुचाने के लिए पुलिस हाकिम कब अपना तीसरा नेत्र खोलेंगे यह अभी भी एक रहस्य बना हुआ है? हैरानी वाली बात है कि अगर पुलिस किसी मटके या सट्टे वाले को पकडने का दम भी दिखाती है तो उसके खिलाफ सिर्फ जुआ एक्ट में उसे पाबंद कर दिया जाता है जिसके चलते वह चंद घंटों में ही अदालत में जाने से बच जाता है और थाने से ही उसे जमानत पर रिहा करने का कई बार फरमान जारी हो जाता है? अगर क्रिकेेट सट्टे, मटके सट्टे और जुआ खिलाने वाले बडे-बडे कुख्यातों पर राजधानी पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करना चाह रही तो यह उसकी मंशा पर शत-प्रतिशत सवालिया निशान लगा रहा है? राजधानी के अन्दर क्रिकेट, मटका सट्टा करने वाले काफी सफेदपोशों के चेहरे किसी से छिपे नहीं है और वह अपने इस काले कारोबार से रात-दिन दौलत कमाने का जो सिलसिला जारी किये हुये हैं उसके चलते काफी दरोगा व पुलिसकर्मी भी पर्दे के पीछे से उनके साथ गठबंधन कर उन्हें पुलिस के होने वाले किसी भी ऑपरेशन से बचाने का खेल खेलने में माहिर हो रखे हैं? सवाल यह है कि अपराध छोटा हो या बडा लेकिन अगर किसी अपराध से लोगों के घर बर्बाद हो रहे हैं तो फिर पुलिस के अफसरों को ऐसे अपराध करने वाले गुनाहगारों को ऐसा सबक सिखाना चाहिए कि वह जल्द जेल से बाहर न आ पाये और गुनाह से कमाई गई दौलत को भी सरकार ने निहित कर उसे सील कर दिया जाये। राजधानी के अन्दर ऐसा दिन कब आयेगा जब सट्टेबाजों के सिंडिकेट को खाकी इस बात का आभास करायेगी कि परिवारों को सट्टे के चस्के में बर्बाद करने का क्या अंजाम होता है?

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