पुष्कर में कभी नहीं दिखता सत्ता का अभिमान

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राजनेता ने सत्ता में अपने सिंघासन पर अहंकार करते हुए अपनों को दूर करके यह ख्वाब पाला कि सिंघासन तो उसकी भपौती है तो उस राजनेता को यह पता ही नहीं चल पाया कि कब उसका सिंघासन डोल गया और जिस सत्ता सिंघासन पर उसे अहंकार हुआ करता था वह अहंकार मिट्टी में इस कदर मिला कि उन्हें यह इल्म होता गया कि सत्ता सिंघासन किसी का नहीं होता है और इस सिंघासन पर आसीन होकर किसी को भी घमंड के समुद्र में नहीं तैरना चाहिए क्योंिक घमंड में बडे-बडे तैराक भी समुद्र में डूबते हुए देखे गये हैं। उत्तराखण्ड के अन्दर पिछले कुछ वर्षों से अधिकांश राजनेता अपने सत्ता के घमंड में इतने डूबे हुये हैं कि उन्हें यह भ्रम हो चला है कि सत्ता का सिंघासन तो हमेशा उनके पास रहेगा लेकिन यह सिंघासन कभी किसी के पास ठहरा है इसका भी इतिहास सब जानते हैं। मुख्यमंत्री ने चार साल से सत्ता चलाने के दौरान कभी भी अभिमान नहीं दिखाया कि वह सल्तनत के बादशाह हैं हालांकि उन्होंने अपने कार्यकाल में आवाम के दिलों में बसने का ही एकमात्र हुनर दिखाया है जो उनकी सियासत को एक बडा आशीर्वाद दे रहा है।
उत्तराखंड का इतिहास हर विषय के लिये उदाहरण बना है। यहां कब राजा को वनवास हो जाए यह उदाहरण देश की राजनीति में सबसे पहले उत्तराखंड का नाम आएगा। यहां दरबारियों से घिरे कृष्ण को जब सुदामा के आंसू नहीं दिखे तो कैसे ग्वाला बन कर उत्तराखंड के गदेरों,पहाड़ों वा झरनों में आज तक ठोकरें खा रहा है और इस उत्तराखंड के कुछ मुखिया ऐसे रहे जो सत्ता के घमंड में इतने चूर रहते थे कि वह हर उस आवाज को दबाने के लिए आगे बढ निकलते थे जो उन्हें आईना दिखाने के लिए आगे आता था। ये उत्तराखंड भले ही बहुत छोटा हो लेकिन इसमें आतंकवाद जैसी फितरत के लोग पनपते रहे हैं यह भी एक बडा सच है? उत्तराखण्ड के अधिकांश राजनेता ऐसे हैं जिन्होंने कोई बहुत बड़ा कारनामा भी नही किया जिससे किसी में उनके प्रति प्यार उमड़ा हो। ये देवभूमि है यहां की सत्ता वही सही चला सकता है जिसने राम को जिया हो, सिंघासन पर हो तो सत्ता ऐसे चलाए जैसे सूर्य की किरण हर किसी को राहत भरा जीवन देती है। जिस राज्य से निकलने वाली गंगा सभी के पाप धोकर उनको पुण्यतमा बनाती है। जहां के पर्वत और तलहटियों से बाह्य एवं आंतरिक शांति का संदेश जाता हो। यहां के हर गली में सन्यास, धर्म-कर्म, दीक्षा वा सनातन शिक्षा का संदेश निकलता हो। सत्ता धर्म से निकलती है। सत्ता का सही संचालन ही प्रधान धर्म है लेकिन राज्य की जनता को पुष्कर सिंह धामी के रूप में ऐसा राजा मिला है जिसके अन्दर मर्यादा पुरषोत्तम राम जैसा वास दिखाई दे रहा है। हालांकि उत्तराखण्ड के अन्दर हमेशा यही आवाज उठती थी कि राज्यवासियों को वो कृष्ण नही मिला जो दरवाजे पर खड़े दीन हीन सुदामा को लेने दौड़ा चला आए ओर अपने सत्ता सुख का अंशदान अपने सुदामा को भी दे सके। हमेशा यह बहस चलती थी कि देवभूमि का मुख्यमंत्री जब तक धर्म परायण नही होगा तब तक यहां दैवीय आपदाएं तथा मानव षडयंत्र होता रहेगा?
त्रेतायुग में भगवान राम ने जिस लीला को समाज के सामने रखा वह आज तक चरितार्थ है। किस प्रकार भगवान राम को राज तिलक होना था और एक रात पहले ही उनको वनवास का आदेश मिल गया। भगवान राम के सहारे सत्ता तक पहुंचने वाले शासक भगवान राम की लीला को अपने जीवन से जोडऩे का प्रयास तक नहीं करते। राम राज्य कैसे स्थापित होता है इसके लिए आपको पहले राम को समझना पड़ेगा केवल नारे लगा कर सत्ता पा लेना मात्र जिनका ध्येय हैं उनके लिए भी भगवान राम ने संदेश दिया कि पिता का आदेश कब आ जाए और आपको सिंहासन की जगह वनवास की ओर जाना पड़ जाए। इससे एक ही संदेश मिलता है कि सत्ता सिंघासन किसी का नहीं। कल तक जो नेता सत्ता को अपनी पपोती समझ बैठे थे आज वो वनवास झेल रहे हैं। भगवान राम ने एक और संदेश अपनी लीला में दिया की उन्होंने चापुलुसो, पूंजीपतियों ओर दरबारियों की जगह शोषित,वंचित,पिछड़े ओर दलितों को अपने साथ लिया। सुग्रीव वंचित था, निस्कासित था उसको साथ लिया, उन्होंने पिछड़े आदिवासी निषाद राज गुहु का साथ लिया, उन्होंने सदा राम राम करने वाली दलित शबरी के घर आसरा लिया। उन्होंने कोई लाव लश्कर या सुरक्षा के घेरे खड़े नही किए। लेकिन उससे अलग इस छोटे से उत्तराखण्ड राज्य में अमन परस्त, संघर्षरत सामान्य जीवन जीने वाली जनता के सामने ऐसा औरा खड़ा कर दिया की कोई परिंदा भी पर नही मार सकता। पूंजीपतियों का जमावड़ा सत्ता संचालन की भूमिका तय करता है। दरबारियों की लंबी फौज सैंकड़ों सुदामाओ को कृष्ण तक नही पहुंचने दे रही है। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर ंिसह धामी ने अपने चार साल के कार्यकाल में आवाम को साथ लेकर चलने का जो दौर शुरू कर रखा है उससे उत्तराखण्ड की जनता मान चुकी है कि मुख्यमंत्री पुष्कर ंिसह धामी एक ऐसे राजनेता हैं जो अपने आपको जनसेवक मानकर आवाम के दिलों में बसने का हुनर सीख चुके हैं और उन्हें पता है कि सत्ता का सिंघासन कभी किसी का नहीं होता।

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