एक जान बचाने को खुद जल गये थे प्रमेंद्र
फायर और दयावान हैं दून के कप्तान
आंदोलनकारी के रक्षक को मिला था गैलेंट्री आवार्ड
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। फिल्मी पर्दे पर 1972 में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की फिल्म अमर प्रेम का वो गीत आज भी लोग अकसर गुनगुनाते हैं कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना…। यह गीत आज राजधानी के पुलिस कप्तान पर सटीक बैठता है क्योंकि उन्होंने जब पुलिस कप्तान की राजधानी में कमान संभाली तो एक-दो अपराध घटित हुये तो कुछ राजनेताओं ने उन्हें निशाने पर लेने का शोर मचाया लेकिन यह शोर मचाने वाले शायद वो दौर भूल गये जब डोबाल की तैनाती राजधानी में सीओ नेहरू कालोनी के रूप में थी तो एक आंदोलनकारी की जान बचाने के लिए वह मौत से भिड़ गये थे और एक जान बचाने के लिए वह खुद जल गये थे और उनके इस अदम्य साहस को देखकर भले ही लोग उन्हें खाकी का रियल हीरो बताने लगे थे लेकिन खाकी का यह दबंग दर्द की उस पीड़ा को कितने अर्से तक सहन करता रहा यह शायद आज उन राजनेताओं को याद नही होगा जो राजधानी में एक-दो अपराध होने के बाद इस जाबांज अफसर को अपने निशाने पर लेने के लिए आगे बढ़ गये थे। राजधानी की जनता जानती है कि डोबाल अपराधियों और माफियाओं के लिए भले ही फायर हों लेकिन एक असहाय और अपराधियों के सताये लोगों के लिए वह हमेशा दयावान की भूमिका में ही दिखाई देते हैं और यही कारण है कि राजधानी की जनता उन्हें एक शानदार आईपीएस मानती है जो अब राजधानी के अन्दर अपराधियों और माफियाओं को नेतस्तनाबूत करने के लिए खुद मोर्चा संभाले हुये हैं।
उत्तराखण्ड में कुछ पुलिस अफसर ऐसे भी दिखाई दिये हैं जो आम जनमानस को न्याय दिलाने में विश्वास रखते हैं और वह कभी भी राजनेताओं के दबाव में किसी के साथ अन्याय करने के लिए कभी आगे नहंी आये जिसके चलते वह आवाम की आंखों के आज भी तारे बने हुये हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आईपीएस प्रमेंद्र डोबाल को राजधानी के कप्तान की कमान सौंपी है और उन्हें दो टूक संदेश दिया है कि वह जनपद को अपराधमुक्त करें। मुख्यमंत्री के विजन को धरातल पर उतारने के लिए प्रमेंद्र डोबाल ने संकल्प ले रखा है कि अगर राजधानी के अन्दर किसी ने भी अपराध करने का गुनाह किया तो वह उसे मिट्टी में मिला देंगे और अगर किसी ने आम जनमानस के सामने माफियागिरी का रूप दिखाने की कोशिश की तो फिर उसे इसका अंजाम भुगतना पडेगा। पुलिस कप्तान को जब राजधानी की कमान मिली तो उस समय एक सनसनीखेज हत्याकांड हुआ था और उसे खोलना उनके लिए पहली प्राथमिकता था तो वहीं राजपुर में एक बार में हुये विवाद को लेकर जब सड़क पर शूटआउट में एक सेना का रिटायर्ड अधिकारी मारा गया था तो उसके बाद विपक्ष के कुछ नेताओं और काफी लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था कि राजधानी में अपराधी बेलगाम हैं और पुलिस कप्तान उन पर नकेल नहीं लगा पा रहे। हालांकि पुलिस कप्तान ने खुद मोर्चा संभालकर इस हत्याकांड में गुनाहगारों को अपना फायर रूप दिखाया था और पुलिस मुठभेड मंे एक बदमाश के पैर में भी गोली लगी थी।
पुलिस कप्तान प्रमेंद्र डोबाल को निशाने पर लेने वालों के लिए कुछ लोगों ने यह गीत गा दिया कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना…। डोबाल को नजदीक से पहचानने वाले लोग कहते हैं कि प्रमेंद्र डोबाल एक ऐसा नाम है जिसने जिले की कमान संभालने के बाद किसी दबाव को नहीं माना और वह शुरूआती दौर में ही एक्शन मोड में आ गये थे। डोबाल का पुलिसिंग में कितना बडा इकबाल रहा है यह किसी से छिपा नहीं है क्योंकि जब प्रमेंद्र डोबाल नेहरू कालोनी इलाके के सीओ थे तो एक आंदोलनकारी की जान बचाने के लिए वह अपने जीवन को ही संकट में डाल गये थे और आंदोलनकारी को बचाने के लिए वह सीधेतौर पर मौत से भिड़ पडे थे। आंदोलनकारी को जीवनदान देने वाले प्रमेंद्र डोबाल खुद जल गये थे और उनके दर्द की पीडा को समझ पाना उस समय आसान नहीं था क्योंकि उनके सामने जीवन मरण का सवाल खडा हुआ था और हर तरफ उनके लिए आवाम दुआयें मांग रहा था कि आंदोलनकारी को जीवनदान देने वाले सीओ जल्द से जल्द दर्द की पीडा से उभर जायें। प्रमेंद्र डोबाल के इस अदम्य साहस पर उन्हें सरकार ने गैलेंट्री आवार्ड से भी नवाजा था। राजधानी के लोग जानते हैं कि प्रमंेद्र डोबाल जहां आम जनमानस के लिए दयावान है तो वहीं अपराधियों और माफियाओं के लिए वह फायर हैं इसलिए उनकी पुलिसिंग पर सबको भरोसा करना चाहिए। आंदोलनकारी को बचाने के लिए जो पुलिस अफसर मौत से भिड गया हो वह पुलिस अफसर अपने जनपद की रक्षा करने के लिए क्या नहीं करेगा इसका अंदाजा सबको होना चाहिए।
