कुर्सी हासिल करने की सियासत!

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जनसेवा करना सिर्फ चुनावी भाषण तक ही सिमटा?
पॉवर मिली और दर्जनों राजनेता और सफेदपोश बन गये दौलतमंद
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का निर्माण इसलिए हुआ था कि राज्य में एक नयापन आयेगा और उनका राज्य जहां भ्रष्टाचार और घोटालों से मुक्त होगा वहीं अपराधियों और माफियाओं का नामोनिशान देखने को नहीं मिलेगा। उत्तराखण्ड में सियासत करने वाले अधिकांश राजनेता चुनावी समर में आवाम के बीच जाकर लच्छेदार भाषण देते हैं कि उनका एक ही विजन है कि वह जनसेवा करें और राज्यवासियों के जो सपने हैं उन्हें पूरा करने के लिए वह दिन-रात आगे बढ़ते चले जायें। अधिकांश राजनेताओं के इन लॉलीपॉप भाषणों के जाल में फंसकर अपना मत उस राजनेता की झोली में डाल देते हैं जो कुर्सी हासिल करने की सियासत में आवाम को खुली आंखों से सपने दिखाने से पीछे नहीं रहता? उत्तराखण्ड में पच्चीस सालों से अधिकांश राजनेता पॉवर में आते ही अहंकार के उस उडनदस्ते पर उडने लग जाते हैं जहां उसे आवाम अदना सा नजर आता है। सवाल हमेशा यही पनपते रहे हैं कि आखिरकार पॉवर में आते ही अधिकांश राजनेताओं और विधायकों के पास ऐसा कौन सा जादुई चिराग आ जाता है जिसे घिस-घिसकर वह मात्र कुछ समय में ही दौलत के उस किले को खडा कर रहे हैं जो अकल्पनीय है और अगर सरकारें ऐसे राजनेताओं और सफेदपोशों की करिश्माई दौलत कमाने का सच पता करने के लिए कभी आगे आने का साहस दिखायें तो वह भी दंग रह जायेंगी कि दौलत कमाने के लिए सफेदपोशों और दर्जनों राजनेताओं ने जनसेवा को छोडकर धन अर्जित करने मे ही अपनी सारी ऊर्जा उडेल दी थी?
यह सच है कि लोकतंत्र होता तो सियासत चंद राजनेताओं की जागीर नहीं होती। चंद राजनेता ही सियासत को विरासत मान अपने परिजनों को सौंपने के लिए अपनी पार्टियों के आगे जिद का खेल न खेलते। उत्तराखण्ड में तमाम राजनीतिक दल भी रेड-कारपेट बिछाकर हमेशा दल-बदल को बढावा देते रहे हैं और वह यह आंकलन करने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं इससे राज्य का कितना नुकसान होता है? गजब बात तो यह है कि हर बार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दल-बदल का खेल राज्य के लिए घातक माना जा रहा है और जब किसी को अपनी सियासत के ऊपर खतरे के बादल मंडराते दिखते हैं तो वह अपनी सीट बदलने के लिए दल-बदल का खेल खेलने में सफल हो जाता है। ऐसे में साफ नजर आ रहा है कि उत्तराखण्ड में सियासत सिर्फ सत्ता और कुर्सी की रह गई है जो कि उत्तराखण्ड के लिए शुभ नहीं मानी जा रही है?
उत्तराखण्ड में पच्चीस साल से सभी राजनीतिक दलों के अधिकांश नेता राज्य में सियासत सिर्फ सत्ता और कुर्सी के लिए करते हुए दिखाई दे रहे हैं और आवाम के सामने वह दम भरते हैं कि जनसेवा करना उनकी आदत बन गई है लेकिन इस जनसेवा के बहाने जिस तरह से राज्य के दर्जनों राजनेताओं ने कई सौ करोड की सम्पत्तियां अर्जित की उससे सवाल खडे होते आ रहे हें कि आखिर इनके पास कौन सा जादुई चिराग है जिसके चलते वह आवाम की सेवा करते-करते अपने खजाने भरने का करिश्माई जादु करने लगे। उत्तराखण्ड में सियासत मुद्दों की नहीं स्वार्थ, कपट, धनबल और बाहुबल की होकर रह गई है और तो और सियासत धर्म और जाति की बनकर रह गई है। उत्तराखण्ड में पांच साल तक अधिकांश मंत्री, विधायक पद पर रहने वालों की सम्पत्तियों में जिस तेजी के साथ इजाफा हुआ है उससे मौजूदा सियासत मुनाफे का कारोबार ही नजर आ रहा है। उत्तराखण्ड में 2027 के अन्दर विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और इन चुनाव से पहले सियासी घमासान मचा वह किसी से छिपा नहीं है। राज्य के कुछ नेताओं को लेकर फिर आशंकाओं का दौर अभी से चलने लगा है कि वह दल बदल का खेल टिकट न मिलने पर खेल सकते हैं? तो वहीं कुछ राजनेताओं ने जिस तरह से हमेशा टिकट न मिलने पर पार्टी से विद्रोह किया था वह भी किसी से छिपा नहीं है?
उल्लेखनीय है कि राजनीतिक पार्टियों के द्वारा दिखाये जाने वाले हसीन सपनों के मकडजाल में आवाम इस कदर फंस जाती है कि उसे जिस राजनीतिक दल के वायदे हसीन नजर आते हैं उसे वह सत्ता में लाने के लिए मतदान के दिन आगे आ जाती है और जो राजनेता आवाम के सामने बडे-बडे दावे करने के लिए आगे आये थे वह चुनाव जीतने के बाद हर बार आवाम से अपनी दूरी बनाने का खेल हमेशा खेलते रहे हैं। टिकट हासिल करने या सत्ता में हिस्सेदारी के लिए राजनेता रातो-रात एक राजनीतिक विचारधारा से कटकर दूसरी विचारधारा का गुणगान कैसे करने के लिए आगे आ जाते हैं यह हैरान करने वाली बात है।

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