भ्रष्ट नेता-कठपुतलीबाज अफसर उत्तराखण्ड पर ‘कलंक’

0
100

प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में इतिहास रहा है कि जब भी किसी राजनीतिक दल की सरकार सत्ता में आई तो काफी अफसर ईमानदारी की राह पर अपना इरादा दिखा गये और काफी अफसर ऐसे देखने को मिले जिन्होंने कुछ राजनेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर उनके इशारों पर नाचने का इरादा साफ किया था और ऐसे कठपुतलीबाज अफसर भले ही कुछ सरकारों के पूर्व मुखियों के दुलारे बने रहे हों लेकिन आम जनमानस के लिए कठपुतलीबाज अफसर हमेशा घातक ही साबित हुये हैं क्योंकि उन्होंने अपने पूर्व मुखियाओं की आंखों पर ऐसी पट्टी बांध दी थी कि जिसके अन्दर से उन्हें राज्य में हो रहे भ्रष्टाचार, घोटाले और हिटलरशाही का तांडव शायद कभी नजर ही नहीं आया और उसके चलते ऐसे कठपुतलीबाज अफसर हिटलरशाही का वो तांडव करते चले गये जो छोटे से राज्य में रहने वाले लोगों को कभी रास ही नहीं आया और ऐसे पूर्व मुख्यमंत्री और उनके कठपुतलीबाज अफसर पॉवर जाने के बाद अपंग दिखते रहे यह जग जाहिर है। आज भी कुछ अफसर कठपुतलीबाज बनकर चंद राजनेताओं के इशारे पर कुछ भी कर गुजरने को तैयार दिखते हैं। मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार और घोटालेबाजों को भले ही सबक सिखाने के मिशन पर आगे बढ रहे हों लेकिन आज भी कुछ राजनेता और उनके कठपुतलीबाज अफसर भ्रष्टाचार करने का वो तांडव कर रहे हैं जो सरकार के मुखिया की छवि को दागदार करने में लगे हुये हैं? ऐसे भ्रष्ट राजनेताओं और कठपुतलीबाज अफसर कभी उत्तराखण्ड के सगे नहीं हो सकते यह भी एक बडा सच है।
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य के अन्दर भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने के मिशन पर आगे बढ रहे हैं और वह हमेशा यही चाहत रखते हैं कि उत्तराखण्ड एक स्वच्छ राज्य बने जहां न कोई भ्रष्टाचार हो और न ही कोई राजनेता व अफसर घोटाला करने का दुसाहस कर सके। हैरानी वाली बात है कि मुख्यमंत्री के विजन को आज भी कुछ भ्रष्ट राजनेता और कठपुतलीबाज अफसर पलीता लगाने में लगे हुये हैं और उन्हें यह भ्रम है कि उनके कारनामों को कोई नहीं देख रहा लेकिन आवाम उंगलियों पर उन भ्रष्ट नेता और अफसरों को गिन रहे हैं जो उत्तराखण्ड के अन्दर एक दाग लगाने से बाज नहीं आ रहे। ऐसे भ्रष्ट नेता और अफसर उत्तराखण्ड के लिए एक बडा कलंक हैं क्योंकि वह आज भी उन शहीदों के सपनों को रौंद रहे हैं जिन्होंने उत्तराखण्ड बनाने के लिए अपनी शहादत दी थी।
उत्तराखण्ड का जन्म होने के बाद से ही देखने में आता रहा है कि आधिकांश सरकारों में कठपुतली अफसरों की एक लम्बीचौडी फौज देखने को मिलती रही है। कठपुतली बने अफसर कुर्सी पर बने रहने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार दिखते रहे हैं जिससे उत्तराखण्ड की जनता के मन में हमेशा यह सवाल खडे होते रहे कि अगर अफसर भी कुछ खादीधारियों के इशारों पर कठपुतली बनकर नृत्य करेंगे तो फिर राज्य के अन्दर आवाम को कैसे पारदर्शिता और स्वच्छता का आईना दिख पायेगा। उत्तराखण्ड के अन्दर पुलिस के काफी अफसर कहने को तो अपने आपको ईमानदार होने का भोपू बजाते रहे और उससे आवाम के मन में एक आशा की किरण दिखती रही कि उन्हें अब न्यायप्रिय अफसरों से एक नई उम्मीद बनेगी लेकिन राज्य बनने के बाद से उनकी यह उम्मीद हमेशा सिर्फ एक उम्मीद बनकर रह गई और आवाम उन कुछ अफसरों को कठपुतली के रूप में ही देखती रही जिनसे उन्हें एक बडी उम्मीद जगी थी कि उन्हें उनके राज में न्याय मिलेगा। उत्तराखण्ड के चंद पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में कुछ पुलिस अफसर ऐसे देखने को मिले जो शुद्ध ईमानदार रहे और उन्होंने कभी भी किसी राजनेता या सफेदपोश के इशारे पर उनके किसी प्रतिद्वंदी पर साजिश के तहत मुकदमा लिखने का खेल नहीं खेला और ऐसे अफसर आज भी राज्य की जनता के हीरो माने जाते हैं। वहीं पुलिस के कुछ अफसर ऐसे देखने को मिले जिन्होंने राज्यवासियों के सामने ईमानदारी का ढोल तो खूब पीटा लेकिन उन्होंने भ्रष्टाचार की रेस में इतनी तेजी के साथ दौड लगाई कि उनके पास अकूत सम्पत्ति बरस गई और उन्होंने जो दौलत का खजाना बनाया वह हमेशा राज्य में चर्चा का विषय बना रहा। ऐसे कुछ अफसर चंद पूर्व मुख्यमंत्रियों और कुछ राजनेताओं के हाथों की कठपुतली बने रहे और उन्होंने कठपुतली बनकर जिस तरह से कुछ राजनेताओं के इशारे पर उनके विरोधियों के खिलाफ फर्जी मुकदमें साजिश के तहत लिखने का जो प्रपंच रचा था उसका शोर उत्तराखण्ड के गलियारों में हमेशा गूंजता रहा। आवाम के मन में हमेशा एक दर्द देखने को मिला कि जिन कुछ पुलिस अफसरों पर उन्होंने भरोसा किया कि वह न्याय के रास्ते पर चलेंगे लेकिन उन्होंने अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ राजनेताओं के इशारे पर जिस तरह से कठपुतली बनकर उनके हाथों में खेलते हुए फर्जी मुकदमें लिखने और कुछ भी कर गुजरने के लिए अगली पक्ति में खडे दिखाई दिये वह खाकी पर भी सवालिया निशान लगाता रहा कि जिनके कंधों पर आवाम की रक्षा करना रहा अगर उनमें से कुछ अफसरों ने वर्दी के रौब में लोगों के साथ हिटलरशाही का रूप दिखाया तो उससे समझा जा सकता है कि राज्य में आवाम और खाकी के बीच दूरियों का फासला क्यों कम नहीं हो पाया।

LEAVE A REPLY