राजनेताओं को जमीनों की भूख

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के अन्दर छोटे से लेकर काफी बडे राजनेताओं के मन में जमीनों को लेकर जो भूख दिखाई दे रही है उससे सवाल खडा हो रहा है कि आखिरकार ऐसे राजनेताओं और सफेदपोशों की जमीनी भूख कब खत्म होगी जो कि उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही जमीनों पर कब्जे कराने से लेकर बडी-बडी जमीनों को अपने पॉवर के दम पर खरीदने का जो खेल खेल रहे हैं वह उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य के लिए घातक है। मुख्यमंत्री ने जमीन माफियाओं पर नकेल लगाने का तो साहस दिखा रखा है लेकिन जब काफी राजनेता और सफेदपोश जमीनों पर कब्जे करने के एजेंडे पर आगे बढ़ जाये तो फिर उनकी नाक में नकेल डालने के लिए आखिर कौन आगे आयेगा यह आज भी एक बडा सवाल बना हुआ है। गढवाल से लेकर कुमांऊ तक में काफी राजनेताओं ने जमीनों के धंधे में अपने आपको आगे किया हुआ है और उसी के चलते वह अपनी पॉवर के बल पर उन जमीनों को भी कब्जाने के एजेंडे पर आगे आ रखे हैं जो लोगों ने खरीदकर उन्हें खुला छोड रखा था। जमीनों पर कब्जों के मामले जिस तरह से उत्तराखण्ड के अन्दर तेजी के साथ बढते जा रहे हैं वह आम जनमानस को एक बडा दर्द दे रहा है और हर तरफ यही बहस चल रही है कि आखिरकार जब बडे-बडे राजनेताओं और सफेदपोशों में जमीन कब्जाने की भूख उमडी हुई है तो फिर आम आदमी कैसे अपनी जमीनों को सुरक्षित रख पायेगा यह अभी भी एक बडा सवाल बना हुआ है।
उत्तराखण्ड का जन्म इसलिए हुआ था कि पहाड व मैदान का विकास होगा और चारो तरफ खुशहाली ही खुशहाली नजर आयेगी। उत्तराखण्ड के लिए शहादत देने वाले आंदोलनकारियों के परिजनों में आज भी इस बात को लेकर काफी पीडा है कि जिस विजन से राज्य का निर्माण किया गया था वह विजन तो आज तक धरातल पर कहीं पूरा नहीं हो पाया है। उत्तराखण्ड में काफी राजनेता और सफेदपोश ऐसे हैं जिन्हें जमीनों की भूख इस कदर लगी हुई है कि वह जमीनों पर कब्जा करने और सरकारी जमीनों पर अपनी गिद की नजर लगाकर उसे किसी न किसी रूप में उसे हथियाने का जो खेल खेला जा रहा है वह किसी से छिपा नहीं है लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वालों की कुंडली खंगालने का कोई पैमाना तय नहीं किया जिसके चलते राज्य की काफी सरकारी जमीनों पर कब्जे करने का जो खेल हो चुका है वह यह बताने के लिए काफी है कि इन जमीनों को कब्जाने के पीछे कुछ सफेदपोशों और कुछ राजनेताओं का हाथ जरूर होता है जिसके चलते सिस्टम भी कब्जा होने वाली जमीनों की ओर देखने के लिए आगे आने से कतराती है। उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी में जब राजधानी के मेयर सुनील गामा की चंद सालों में दस गुना सम्पत्ति बढने को लेकर जिस तरह से उन पर आरोपों का अम्बार लगा है वह सरकार और संगठन के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि एक ओर तो सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ बडी मुहिम चलाने का दम भर रही है वहीं उनके अपनों पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं तो सरकार आखिर क्यों खामोश हो रखी है यह आवाम की समझ में नहीं आ रहा है। उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी में कुछ राजनेताओं में जमीनों को कब्जाने की जो भूख देखने को मिल रही है अगर राज्य के अन्दर लोकायुक्त का गठन हो रखा होता तो आज वो सफेदपोंश और काफी राजनेता आवाम के सामने बेनकाब हो जाते। उत्तराखण्ड में काफी राजनेताओं में जमीनों की जो भूख देखने को मिल रही है वह उत्तराखण्ड राज्य के लिए शुभ संकेत नहीं है क्योंकि कुछ राजनेता और कुछ सफेदपोश जिस तरह से नालों-खालों की जमीनों को भी अपने कब्जे में लेने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं वह काफी हैरान करने जैसा ही दिखाई दे रहा है और यह बात उभर रही है कि आखिरकार जिन राजनेताओं ने जमीनों की लम्बीचौडी फैरिस्त अह्यपने पाले में कर रखी है उनके चेहरे बेनकाब करने के लिए आखिर कौन आगे आयेगा।

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