देहरादून(प्रमुख संवाददाता)। यूकेडी में पिछले दिनों से चल रहे घमासान के बाद यह समय बतौर राजनैतिक दृष्टिकोण इस बात को परखने की भी है कि पिछले कई सालों से मतदाताओं की पसंद से दूर होता जा रहा यह क्षेत्रीय दल वास्तव में क्षेत्रीयता की पहचान और उससे सम्बंधित मुद्दों की बुनियाद पर अब खरा उतरता भी है या नहीं…? पिछले कुछ सालों से यूकेडी जनमुद्दों के बजाय अपने भीतर चल रहे द्वन्दों से ही जूझती नजर आयी, पार्टी के अंदर युवा नेतृत्व की जरूरत के सवाल के पीछे भी कारण यही है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सुलगते सवालों पर दूरियां बनाये रखी, अगर गौर से देखें तो पार्टी शुरुवात में दस सालों तक सत्ता में शामिल रही और दिवाकर भट्ट राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को आज के मुद्दों पर अपनी उपयोगिता इन सवालों का जवाब देते हुए सिद्ध करनी चाहिये की दिवाकर भट्ट के सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए उन नीतियों का कितना विरोध किया गया था जिन पर आज सवाल उठाए जा रहे हैं …? सवाल किया जाना चाहिए कि कैबिनेट मंत्री रहते हुए दिवाकर भट्ट नें कितनी बार राजधानी गैरसैंण के लिए पुरजोर तरीके से प्रश्न उठाये और सवाल किया जाना चाहिए कि राजस्व मंत्री रहते हुए कड़े भूकानून की कितनी शिफारिशें की गयी ..? इस बार तो उक्रांद ने राज्य स्थापना दिवस पर भी गैरसैंण राजधानी का सांकेतिक धरना शायद नहीं किया ….? फिलहाल मतदाता की नजर से देखें तो इस क्षेत्रीय कहे जाने वाले राजनैतिक दल की स्थिति यह है कि निर्दलीय और बहुजन समाजवादी पार्टी का वोट बैंक उत्तराखंड क्रांति दल के वोट बैंक से ज्यादा है। शायद दल की इस हालत के पीछे पार्टी नेतृत्व का स्थानीय मुद्दो पर करनी और कथनी के अंतर का ही परिणाम होगा जिसे यूँ भी समझा जा सकता है कि देहरादून के नदी नालों पर झुग्गी झोपडिय़ों का अतिक्रमण पर पार्टी के लोग भी अतिक्रमणकारियों के समर्थन में निकल पड़े..? मूल निवास/स्थायी निवास पर बयान से आगे नही बढ़ पाये, शराब की फैक्ट्रियां उर्फ बॉटलिंग प्लांट, भाँग…, भूमि खरीद .पर्वतीय कृषि की सिमटती जोत को लेकर कोई चिंता जो निर्णयात्मक परिणाम लेकर आती कभी फलित होती दिखाई नहीं दी? खैर बीते दिनों हुए घटनाक्रम के बाद अब सवाल केवल इस बात का नहीं कि यूकेडी क्या कर सकी और आगे क्या कर पायेगी…. ? बल्कि सबसे बड़ा सवाल इस बात का है कि पार्टी में युवा नेतृत्व के बहाने कहीं कोई छुपा हुआ एजेंडा तो हावी नहीं है …? सबसे बड़ा सवाल यूकेडी के कार्यालय प्रभारी का पुलिस को दी गयी तहरीर को पढऩे के बाद उठता है जिसमें कहा गया है कि निष्काषित गुट के नेताओं द्वारा बाउंसरों का उपयोग किया गया …! तो सवाल कि आखिर ये बाउंसरों की जरूरत क्यों …? बाउंसर रखने की सलाह किसने दी …? उन्हें कौन आगे लाया? कहाँ से आये …? फंडिंग कहाँ से हुई किसने की और क्यों की …? ये बाउंसर वाली मानसिकता के पीछे खेल कोई और तो नहीं ..?
अगर बाउंसर वाली बात सही है तो यूकेडी की तमाम गलतियों के बावजूद भी यूकेडी के प्रति सहानुभूति रखने वाली उत्तराखंड की आवाम को इस विषय को इस मायने में गम्भीरता से लेना होगा कि यूकेडी का यह गुट किसी न किसी के इशारों पर काम कर रहा है क्योंकि बाउंसर जैसी बलाओं का उपयोग की मानसिकता से तो आज तक इस सूबे में कोई राजनैतिक दल ग्रसित नहीं हुआ क्योंकि ये शोशेबाजी और इनकी जरूरत का इस सूबे के व्यवहार का कोई इतिहास नहीं? सच मानिए तो बाउंसरों का उपयोग की मानसिकता कब्जाई संस्कृति का परिचायक है और ऐसा होने पर यूकेडी के भविष्य की ओर नजर उठा कर ये अंदाजा लगाना कत्तई मुश्किल नहीं कि जो बाउंसरों के दम पर किसी पार्टी कार्यालय पर कब्जा जमा सकते है वे भविष्य में क्या न कब्जा लें इसका कोई भरोसा नहीं ….?
जैसा कि नीचे चस्पा पत्र में दर्ज है कि बाउंसरों का उपयोग किया गया तो दूसरा महत्वपूर्ण सवाल कि यूकेडी के मौजूदा अथवा निष्कासित नेताओं में से किसकी आर्थिक स्थिति इतनी प्रबल है कि वो बाउंसर जैसी व्यवस्थाओं के उपयोग को स्वीकार सकता है …? आखिर बाउंसरों के लिए फंडिंग कहाँ से और क्यों हो रही है ……? सवाल उन फंड प्रोवाइडरों को खोजने का भी है और इस बात का भी कि कहीं क्षेत्रीयता की आड़ में मकसद कुछ और न हो..? दिल्ली वाले दल दिल्ली वाले दल बोल कर क्षेत्रीयता की विचारधारा का झंडा उठाये सो कॉल्ड युवा अथवा अधेड़ नेताओं से सवाल किया जाना चाहिए कि अगर दिल्ली वाले दलों से इतनी नफरत है तो ये दिल्ली गुडग़ांव के शराब हुक्काबारों या लम्पटों की बाऊंसर वाली परंपरा क्यों…? पैसा कहां से आया किसने दिया और आखिर मकसद क्या …? बीते घटनाक्रम के चाहे और भी कोई कारण हो लेकिन इस घटना के बाद यह सवाल भी गहराता है कि यूकेडी अथवा यूकेडी कार्यालय के आस पास जो भी घटित हो रहा है उसमें कुछ न कुछ ऐसा छिपा है जो कामयाब हो गया तो ये उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय दलों की बेहतर राजनीति की असल संभावनाओं को खत्म कर देगा। कुछ तो है जो इस सब हंगामें के बावजूद भी दिख नही पा रहा पर जो भी हो गड़बड़ ही है?
