हत्यारों पर उम्रकैद का शिकंजा
एसआईटी बनाई, परिवार को मद्द और वकील भी कराया था मुहैया
गजबः विपक्ष अब भी सियासत में व्यस्त
राजेश शर्मा
देहरादून। उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की मांग आज भी उतनी ही संवेदनशील है, जितनी घटना के समय थी। राजनीतिक आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि मुख्यमंत्री नेे अंकिता को न्याय दिलाने के लिए राज्यवासियों को वचन दिया था और उस वचन को निभाने के लिए आईपीएस के नेतृत्व वाली एसआईटी ने जांच का शिकंजा ऐसा बुना कि हत्यारे जमानत पर नहीं छूट पाये और मुख्यमंत्री की सख्त निगरानी में हत्यारों पर उम्रकैद का शिकंजा न्यायालय ने कसा लेकिन हैरानी वाली बात है कि विपक्ष अब भी अंकिता भंडारी हत्याकांड में सियासत करने में व्यस्त नजर आ रहा है। इस मामले में अब तक क्या कदम उठाए और किन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं?
अंकिता हत्याकांड के बाद तीनों मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी, विशेष जांच दल (एसआईटी) की जांच, अदालत में आरोपपत्र दाखिल होना और तीनों दोषियों को उम्रकैद की सजा मिलना इस मामले के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं। हालांकि अदालत का फैसला न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम है, इसे केवल किसी सरकार की उपलब्धि बताना उचित नहीं होगा। फिर भी जांच और अभियोजन के दौरान प्रशासन की भूमिका तथा सरकार की ओर से उठाए गए कदमों को पूरे घटनाक्रम से अलग नहीं किया जा सकता। इस मामले में सबसे संवेदनशील मुद्दा कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठे सवाल रहे हैं। दिसंबर 2025 में सोशल मीडिया पर प्रसारित कथित ऑडियो क्लिप के बाद इस पहलू को लेकर फिर बहस तेज हुई। जनवरी 2026 में अंकिता के माता-पिता ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात कर सीबीआई जांच की मांग रखी। उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार, मुख्यमंत्री ने परिवार की मांग को स्वीकार करते हुए सीबीआई जांच की संस्तुति को मंजूरी दी।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि परिवार की ओर से उठाए गए सवालों को केंद्रीय जांच एजेंसी के समक्ष ले जाने का रास्ता खोला गया। फरवरी 2026 में कथित वीआईपी एंगल की जांच के लिए अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध नई एफआईआर दर्ज किए जाने का विवरण भी सामने आया। हालांकि जांच की संस्तुति और थ्प्त् दर्ज होने का अर्थ किसी व्यक्ति का दोष सिद्ध होना नहीं है। ’सरकार से सवाल जरूर पूछिए, लेकिन अब तक हुई कार्रवाई का रिकॉर्ड भी जनता के सामने रखिए।’ लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी सरकार से जवाब मांगना है, लेकिन सार्वजनिक बहस में गिरफ्तारी, जांच, अभियोजन, अदालत के फैसले और परिवार की मांग पर उठाए गए कदमों का उल्लेख भी उतना ही आवश्यक है।
सरकार की ओर से परिवार को 25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता, रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास तथा सरकारी अधिवक्ताओं में बदलाव जैसे कदम उठाए जाने की जानकारी भी दी गई है। इन दावों के क्रियान्वयन और वास्तविक लाभ का स्वतंत्र आकलन जरूरी है, लेकिन इन्हें चर्चा से पूरी तरह बाहर रखना भी मामले की अधूरी तस्वीर प्रस्तुत करेगा। अक्टूबर 2026 में अंकिता के माता-पिता की सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात और निष्पक्ष जांच के आश्वासन के बाद अब निगाहें जांच की प्रगति पर हैं। कथित वीआईपी की पहचान, उसकी संभावित भूमिका और वायरल दावों की सत्यता का निर्णय राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार के लिए इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी यही है कि जांच स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से आगे बढ़े तथा परिवार के शेष सवालों का जवाब मिले। इसके साथ ही पर्यटन प्रतिष्ठानों में कार्यरत महिलाओं की सुरक्षा, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है। अंकिता को न्याय दिलाने की प्रक्रिया में जो कदम उठाए गए हैं, उनका रिकॉर्ड जनता के सामने रहना चाहिए। साथ ही जिन सवालों का जवाब अभी जांच से आना बाकी है, उन्हें भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। ’न्याय की वास्तविक कसौटी किसी राजनीतिक दावे की जीत नहीं, बल्कि सच्चाई का सामने आना, दोषियों की जवाबदेही और पीड़ित परिवार का कानून पर भरोसा है।’ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा बनाई गई एसआईटी ने 88 दिनों में जांच पूरी कर लगभग 500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। 30 मई 2025 को तीनों दोषियों को उम्रकैद हुई। मुख्यमंत्री ने 9 जनवरी 2026 को सीबीआई जांच की संस्तुति की और फरवरी में नई एफआईआर दर्ज हुई थी।


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