धामी का राजनीति में शानदार अध्याय

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प्रमुख संवाददाता
’देहरादून।’ राजनीति के इतिहास में कुछ नाम सत्ता की कुर्सियों के कारण याद किए जाते हैं, कुछ अपने फैसलों के कारण और कुछ इसलिए कि उनका राजनीतिक सफर सामान्य परिस्थितियों से अलग रास्तों से गुजरता है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक यात्रा को इसी तीसरी कसौटी पर भी देखा जा सकता है। पहाड़ के एक सामान्य परिवार से निकलकर प्रदेश की सत्ता के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाले धामी की कहानी में संगठन का अनुशासन है, राजनीतिक संघर्ष के लंबे वर्ष हैं, अप्रत्याशित परिस्थितियां हैं और उन परिस्थितियों के बीच आगे बढ़ने के कई महत्वपूर्ण पड़ाव भी हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री की कुर्सी कभी आसान नहीं रही। राज्य गठन के बाद नेतृत्व परिवर्तन, राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता के भीतर बदलते समीकरण प्रदेश की राजनीति का हिस्सा रहे हैं। ऐसे राजनीतिक परिवेश में पुष्कर सिंह धामी का मुख्यमंत्री बनना और फिर लगातार दूसरे कार्यकाल में जिम्मेदारी संभालना अपने आप में एक उल्लेखनीय घटनाक्रम है। पिथौरागढ़ जनपद के तुण्डी गांव में जन्मे पुष्कर सिंह धामी के पिता शेर सिंह धामी भारतीय सेना में सूबेदार रहे। एक सैनिक परिवार की पृष्ठभूमि से निकले धामी ने छात्र राजनीति और संगठनात्मक गतिविधियों के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में कदम रखा। लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ी और बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन की जिम्मेदारी संभाली। राजनीति में अक्सर ऊंचे पदों पर बैठे नेताओं की चर्चा होती है, लेकिन उन वर्षों की चर्चा कम होती है, जब कोई कार्यकर्ता बिना किसी बड़े संवैधानिक पद के संगठन के लिए काम करता है। धामी के राजनीतिक जीवन में भी ऐसे अनेक वर्ष रहे। उन्होंने युवा मोर्चा से लेकर विधानसभा तक अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं। वर्ष 2012 में खटीमा से पहली बार विधायक चुने गए और 2017 में दोबारा विधानसभा पहुंचे। इन दोनों चुनावों ने उनकी राजनीतिक यात्रा को मजबूती प्रदान की।
जुलाई 2021 में उत्तराखंड की राजनीति ने अप्रत्याशित मोड़ लिया। भाजपा नेतृत्व ने पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंप दी। उस समय प्रदेश में उनसे वरिष्ठ और अधिक राजनीतिक अनुभव रखने वाले कई नेता मौजूद थे। ऐसे में धामी का चयन राजनीतिक हलकों के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम था। यह निर्णय संगठन के भीतर बदलते नेतृत्व समीकरणों का संकेत भी माना गया। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड में लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का जनादेश हासिल किया। प्रदेश में हर पांच वर्ष बाद सत्ता परिवर्तन की पुरानी चुनावी प्रवृत्ति इस परिणाम के साथ टूट गई। हालांकि मुख्यमंत्री धामी स्वयं खटीमा विधानसभा सीट से चुनाव नहीं जीत सके। यह परिणाम उनके राजनीतिक जीवन के लिए एक कठिन मोड़ था। चुनावी परिणाम के बाद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के सामने नए मुख्यमंत्री के चयन का प्रश्न था। राजनीतिक चर्चाओं और संभावनाओं के बीच पार्टी ने पुष्कर सिंह धामी को ही दोबारा मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया। यह फैसला इस दृष्टि से महत्वपूर्ण था कि पार्टी ने विधानसभा चुनाव में व्यक्तिगत पराजय के बावजूद उन्हें सरकार का नेतृत्व जारी रखने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद चंपावत विधानसभा सीट से निर्वाचित विधायक कैलाश गहतोड़ी ने धामी के लिए अपना स्थान खाली किया। उपचुनाव में मुख्यमंत्री धामी ने 55 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की और विधानसभा में वापसी की। इस घटनाक्रम ने उनके राजनीतिक सफर में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
भारतीय राजनीति में चुनावी जीत और पराजय स्वाभाविक घटनाएं हैं, लेकिन किसी नेता के राजनीतिक जीवन का महत्व केवल एक चुनाव के परिणाम से तय नहीं होता। संगठन में उसकी भूमिका, नेतृत्व के साथ उसके संबंध, राजनीतिक परिस्थितियां और जनता के बीच उसका जनाधार भी उसके सफर को प्रभावित करते हैं। धामी की राजनीतिक यात्रा इन सभी पहलुओं को एक साथ देखने का अवसर देती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के राजनीतिक व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी उम्र और अनुभव के बीच का संतुलन भी है। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री बनने के समय वह उत्तराखंड के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री थे। इसके बावजूद उनके पीछे छात्र राजनीति, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और दो बार विधायक रहने का अनुभव मौजूद था। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य का नेतृत्व करना केवल राजनीतिक प्रतिष्ठा का विषय नहीं है। यहां मुख्यमंत्री के सामने पहाड़ के दूरस्थ गांवों से लेकर तेजी से विकसित होते मैदानी शहरों तक अलग-अलग चुनौतियां हैं। सीमांत क्षेत्रों की सुरक्षा, पलायन, रोजगार, आपदा प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण ऐसे विषय हैं जिन पर लिए गए निर्णय प्रदेश की आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करते हैं। धामी के लिए भी अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि उनका राजनीतिक सफर प्रशासनिक और विकास संबंधी उपलब्धियों में किस हद तक परिवर्तित होता है। संगठन का भरोसा किसी नेता को नेतृत्व की जिम्मेदारी दे सकता है, चुनावी जनादेश उसे संवैधानिक आधार प्रदान कर सकता है, लेकिन जनता के जीवन में दिखाई देने वाले परिवर्तन ही किसी सरकार के कार्यकाल की स्थायी पहचान बनते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति के पिछले ढाई दशकों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने वाले नेताओं के सामने राजनीतिक स्थिरता और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना हमेशा महत्वपूर्ण चुनौती रही है। धामी के दूसरे कार्यकाल ने नेतृत्व की निरंतरता का एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस निरंतरता का प्रदेश के विकास पर कितना प्रभाव पड़ा, इसका आकलन योजनाओं के क्रियान्वयन और उनके परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। पुष्कर सिंह धामी की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात केवल उनका मुख्यमंत्री बनना नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का क्रम है जिनसे गुजरकर वह इस पद तक पहुंचे और फिर इस जिम्मेदारी पर बने रहे। छात्र राजनीति का कार्यकर्ता, युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष, दो बार खटीमा का विधायक, उत्तराखंड का सबसे युवा मुख्यमंत्री, विधानसभा चुनाव की व्यक्तिगत पराजय और फिर चंपावत से वापसी ये सभी घटनाएं मिलकर उनके राजनीतिक जीवन की विशिष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। ’इतिहास की अपनी एक विशेषता है। वह किसी नेता के पक्ष में लगाए गए नारों या उसके सम्मान में लिखे गए प्रशंसात्मक शब्दों से अधिक महत्व उन घटनाओं को देता है, जिन्होंने उसके राजनीतिक जीवन की दिशा बदली। पुष्कर सिंह धामी के जीवन में वर्ष 2022 का घटनाक्रम ऐसा ही एक अध्याय है, जिसे उत्तराखंड की राजनीतिक यात्रा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।’ ’सत्ता तक पहुंचना राजनीति का एक पड़ाव है, लेकिन उस जिम्मेदारी को निभाते हुए प्रदेश के भविष्य पर स्थायी प्रभाव छोड़ना कहीं बड़ी चुनौती। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने अब यही अवसर है कि उनके राजनीतिक संघर्ष की कहानी के साथ उत्तराखंड के विकास की उपलब्धियां भी उसी गंभीरता से दर्ज हों।

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