सियासत में बढ़ती ताकत ने बदले सारे समीकरण
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में मुख्यमंत्री तो कई बने, लेकिन राजनीतिक तूफानों के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखना हर किसी के बस की बात नहीं रही। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जब प्रदेश की बागडोर संभाली थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि वह इतने कम समय में प्रदेश की राजनीति के सबसे चर्चित और प्रभावशाली चेहरों में अपनी जगह बना लेंगे। आज हालात यह हैं कि धामी को राजनीतिक चुनौती देने के दावे तो बहुत होते हैं, लेकिन उनके सामने बराबरी का जनाधार और नेतृत्व प्रस्तुत करना विरोधियों के लिए आसान नजर नहीं आता।
धामी को कमजोर समझने वालों के लिए उनकी राजनीतिक यात्रा अपने आप में एक बड़ा जवाब है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में अपनी सीट गंवाने के बावजूद भाजपा नेतृत्व ने दोबारा मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी उन्हीं को सौंपी। यह फैसला बताता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का भरोसा धामी पर कितना मजबूत रहा है। इसके बाद उन्होंने जिस तरह अपने फैसलों और राजनीतिक सक्रियता से पहचान बनाई, उसने सत्ता के गलियारों से लेकर विपक्षी खेमे तक उन्हें चर्चा के केंद्र में बनाए रखा। उत्तराखंड की राजनीति में धामी की सबसे बड़ी ताकत उनका आत्मविश्वास और कठिन फैसले लेने की छवि है। समान नागरिक संहिता लागू करने, नकल विरोधी कानून और अन्य नीतिगत फैसलों ने उन्हें एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित किया है, जो विवादों और विरोध के बीच भी अपने राजनीतिक एजेंडे पर आगे बढ़ने का संदेश देते हैं।
सियासत के मैदान में धामी की रफ्तार तेज है, लेकिन सवाल यह भी है कि उनकी बराबरी का राजनीतिक चेहरा आखिर कौन बनेगा? कांग्रेस के सामने जहां मजबूत विकल्प प्रस्तुत करने की चुनौती है, वहीं भाजपा के भीतर भी धामी प्रदेश नेतृत्व का प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा में शीर्ष नेतृत्व का विश्वास उनके राजनीतिक कद को अतिरिक्त मजबूती देता है। धामी की राजनीतिक यात्रा ने यह भी साबित किया है कि चुनावी हार किसी नेता के राजनीतिक भविष्य का अंतिम फैसला नहीं होती। खटीमा की हार के बाद मुख्यमंत्री पद पर वापसी और फिर चंपावत उपचुनाव में बड़ी जीत ने उनकी राजनीतिक कहानी को एक नया मोड़ दिया। हालांकि मुख्यमंत्री के सामने बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासनिक जवाबदेही जैसी गंभीर चुनौतियां अब भी खड़ी हैं। विपक्ष इन्हीं मुद्दों पर सरकार को घेरता है। लेकिन राजनीतिक मुकाबले में केवल सरकार की कमियां गिनाना पर्याप्त नहीं होता, जनता के सामने विश्वसनीय विकल्प भी प्रस्तुत करना पड़ता है।
धामी की राजनीतिक उड़ान को रोकने के लिए विरोधियों को केवल नारों की नहीं, बल्कि मजबूत जनाधार और ठोस रणनीति की जरूरत होगी। आज उत्तराखंड की सियासत में धामी का नाम एक ऐसे नेता के रूप में उभरा है, जिसने अपनी राजनीतिक जमीन पर लगातार पकड़ बनाए रखने का प्रयास किया है। उत्तराखंड की राजनीति का मौजूदा संदेश साफ हैकृधामी को चुनौती देना आसान है, लेकिन उन्हें राजनीतिक रूप से पीछे छोड़ना कहीं अधिक कठिन। मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले कई चेहरे इतिहास का हिस्सा बन गए, मगर पुष्कर सिंह धामी अपनी अलग राजनीतिक पहचान के साथ भविष्य की सियासत का केंद्र बने हुए हैं। अब असली सवाल यह नहीं कि धामी को चुनौती कौन देगा, बल्कि यह है कि उनके सामने टिकने के लिए विपक्ष कितना मजबूत विकल्प खड़ा कर पाएगा।


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