धामी का दमदार है रिपोर्ट कार्ड

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चंद मंत्रियों-विधायकों का अहंकार बन सकता है मुसीबत!
सत्ता के अधिकांश विधायक आवाम की रडार पर
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री की कार्यशैली और नेतृत्व को लेकर एक अलग ही तस्वीर उभर रही है। प्रदेश में विकास कार्यों, जनहित के फैसलों और प्रशासनिक सक्रियता के दम पर धामी अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने में जुटे हैं। उनके समर्थक उन्हें उत्तराखंड की सियासत का सुपर टॉपर बता रहे हैं। लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू भाजपा संगठन और सरकार के लिए चिंता का विषय बन सकता है। सवाल उठ रहा है कि जिस जनता का भरोसा जीतने के लिए मुख्यमंत्री लगातार प्रयास कर रहे हैं, क्या सरकार के कुछ मंत्री और भाजपा विधायक उसी भरोसे को कमजोर कर रहे हैं?
उत्तराखंड की राजनीति में यह विरोधाभास बेहद दिलचस्प है। एक तरफ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की लोकप्रियता और विकास के प्रति प्रतिबद्धता की चर्चा होती है, तो दूसरी तरफ कुछ जनप्रतिनिधियों के व्यवहार, जनता से संवाद की कमी और सत्ता के कथित अहंकार को लेकर नाराजगी की आवाजें भी सुनाई देती हैं। हालांकि इस नाराजगी की व्यापकता का आकलन किसी प्रमाणित जनमत सर्वेक्षण के बिना नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड गठन के बाद प्रदेश ने कई मुख्यमंत्री देखे। किसी का कार्यकाल राजनीतिक अस्थिरता में बीता तो किसी को संगठनात्मक खींचतान का सामना करना पड़ा। लेकिन पुष्कर सिंह धामी ने अपनी कार्यशैली से अलग पहचान बनाने का प्रयास किया है। समान नागरिक संहिता लागू करने, नकल विरोधी कानून, निवेश आकर्षित करने की कोशिशों, सड़क संपर्क बढ़ाने और प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही पर जोर देने जैसे कदमों को उनकी सरकार अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती रही है।
धामी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनकी सक्रियता मानी जाती है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा हो, जनसमस्याओं के समाधान के निर्देश हों या अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात, मुख्यमंत्री लगातार यह संदेश देने की कोशिश करते दिखाई देते हैं कि सरकार का केंद्र आम जनता है। हालांकि इन योजनाओं और फैसलों की वास्तविक सफलता का अंतिम आकलन उनके धरातलीय परिणामों से ही होगा। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल सरकार की नीतियों से अधिक जनप्रतिनिधियों के व्यवहार को लेकर खड़ा हो सकता है। प्रदेश में ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि कुछ जनप्रतिनिधियों तक आम आदमी की पहुंच आसान नहीं है। कहीं कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के आरोप लगते हैं, तो कहीं लोगों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री स्वयं अधिकारियों को जनता की समस्याओं का समयबद्ध समाधान करने के निर्देश दे रहे हैं, तो क्या सभी मंत्री और विधायक उसी भावना के साथ काम कर रहे हैं? सत्ता का वास्तविक अर्थ जनता की सेवा है, न कि जनता पर रौब जमाना। जनप्रतिनिधि यदि चुनाव जीतने के बाद अपने मतदाताओं से दूरी बना लें, तो सबसे अधिक नुकसान उस राजनीतिक दल को होता है जिसने उन्हें जनता के बीच भेजा है।
उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता और विधायकों के स्थानीय प्रदर्शन को अलग-अलग कसौटियों पर परखना जरूरी है। किसी क्षेत्र में सड़क खराब है, अस्पताल में चिकित्सक नहीं हैं, बेरोजगार युवाओं को अवसर नहीं मिल रहे या किसी फरियादी की सुनवाई नहीं हो रही, तो जनता सबसे पहले अपने विधायक और संबंधित मंत्री से जवाब चाहती है। यदि जनप्रतिनिधि जनता की परेशानी सुनने के बजाय अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन करने लगें, तो नाराजगी बढ़ना स्वाभाविक है। यही वह स्थिति है जहां मुख्यमंत्री की सकारात्मक छवि भी स्थानीय असंतोष की भरपाई नहीं कर पाती। राजनीति का इतिहास गवाह है कि लोकप्रिय नेतृत्व के बावजूद कमजोर स्थानीय प्रदर्शन किसी भी पार्टी के लिए चुनावी चुनौती बन सकता है। उत्तराखंड में भाजपा के सामने विपक्ष की राजनीतिक चुनौती अपनी जगह है, लेकिन पार्टी को अपने जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
कुछ मंत्रियों और विधायकों की कार्यशैली पर उठने वाले सवालों को केवल राजनीतिक विरोध बताकर खारिज करना उचित नहीं होगा। जहां शिकायतें हैं, वहां निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। साथ ही सभी जनप्रतिनिधियों को एक ही तराजू पर तौलना भी उचित नहीं है, क्योंकि अनेक विधायक अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहकर जनसमस्याओं के समाधान का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन जिन क्षेत्रों में जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद कमजोर पड़ रहा है, वहां संगठन और सरकार दोनों को गंभीरता दिखानी होगी। भाजपा नेतृत्व के लिए जरूरी है कि मंत्रियों और विधायकों का रिपोर्ट कार्ड केवल सरकारी बैठकों, मंचों पर भाषणों और सोशल मीडिया की तस्वीरों से तैयार न हो। उसका आधार जनता की संतुष्टि, विकास कार्यों की गुणवत्ता और शिकायतों का वास्तविक समाधान होना चाहिए। मुख्यमंत्री धामी की राजनीतिक छवि को लेकर समर्थकों में उत्साह दिखाई देता है, लेकिन यह मान लेना कि उत्तराखंड की जनता सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को भूल चुकी है, राजनीतिक अतिशयोक्ति होगी। हर मुख्यमंत्री की अपनी उपलब्धियां, सीमाएं और राजनीतिक विरासत रही है।
धामी के सामने चुनौती केवल अपनी उपलब्धियों को आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि पूरी सरकार और भाजपा विधायक दल में जवाबदेही की समान संस्कृति स्थापित करने की भी है। मंत्रियों और विधायकों को समझना होगा कि जनता ने उन्हें पांच वर्षों के लिए जिम्मेदारी सौंपी है, स्थायी अधिकार नहीं। चुनाव के समय हाथ जोड़कर वोट मांगना और चुनाव जीतने के बाद फरियादियों से दूरी बना लेना लोकतांत्रिक जवाबदेही के अनुरूप नहीं है। उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ते राजनीतिक माहौल में भाजपा के लिए मुख्यमंत्री धामी की छवि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी हो सकती है। लेकिन चुनाव केवल मुख्यमंत्री के नाम पर नहीं, स्थानीय उम्मीदवारों की उपलब्धियों, व्यवहार और जनता के अनुभवों के आधार पर भी लड़े जाते हैं। यदि सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचता, स्थानीय समस्याएं बनी रहती हैं और जनप्रतिनिधियों के व्यवहार को लेकर असंतोष बढ़ता है, तो उसका राजनीतिक असर सामने आ सकता है। मुख्यमंत्री धामी के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। पहली, विकास और जनकल्याण के अपने एजेंडे को ठोस परिणामों में बदलना। दूसरी, मंत्रियों और विधायकों को यह स्पष्ट संदेश देना कि सरकार की प्रतिष्ठा जनता के सम्मान और समस्याओं के समाधान से ही सुरक्षित रह सकती है। उत्तराखंड की राजनीति में धामी को सुपर टॉपर बताने वाले समर्थकों के उत्साह के बीच सबसे अहम बात यही है कि मुख्यमंत्री का रिपोर्ट कार्ड जितना मजबूत होगा, उतनी ही सख्त कसौटी पर उनके मंत्रियों और विधायकों का प्रदर्शन भी परखा जाएगा। सत्ता के गलियारों में मिली प्रतिष्ठा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण जनता के बीच अर्जित विश्वास है।

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