नशेडियों से डरते शहर के चंद इलाके!

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने राज्य के युवाओं को नशे से बचाने के लिए ऑपरेशन नशामुक्त राज्य का संकल्प ले रखा है जिसके चलते सभी जिलों में पुलिस अफसर नशे के खिलाफ आवाम व स्कूली बच्चों को उससे दूर रहने का पाठ पढा रहे हैं लेकिन आश्चर्यचकित बात है कि राजधानी के चंद शहरी इलाकों में नशेडियों व नशामाफियाओं के आतंक से काफी संख्या में परिवार डरे हुए दिखाई दे रहे हैं और वह इस बात को लेकर ज्यादा भयभीत हैं कि आखिर उनकी आवाज सुनने वाला कौन है? चीता पुलिस फोर्स के जवान शहर के कुछ इलाकों में सिर्फ रात्रि के समय ही सायरन बजाते हुए इधर से उधर दौडते हुए नजर आ जाते हैं जबकि उन्हें नशा माफिया और नशेडियों के झुंड कुछ इलाकों में क्यों नजर नहीं आते यह एक गंभीर सवाल खडा हो चुका है? गजब की बात है कि पुलिस के कुछ अफसर और काफी थानेदार आम आदमी का फोन उठाने की जहमत ही नहीं करते जो उन्हें इस बात की सूचना देना चाहते हैं कि उनके इलाके में उनके घरों के बाहर किस तरह से नशेडियों और नशा माफियाओं का जमावडा उनके अन्दर एक बडा डर पैदा किये हुये है? अगर कुछ अफसर और कुछ थानेदार सरकारी फोन भी उठाने की जहमत नहीं कर रहे तो उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सीएम के नशामुक्त उत्तराखण्ड के सपने पर किस तरह से पुलिस के कुछ अफसर और थानेदार ग्रहण लगा रहे हैं? सिर्फ नशे के खिलाफ कार्यक्रम कर पुलिस के कुछ अफसर और दरोगा मीडिया में अपनी फोटो देकर अगर आवाम को संदेश दे रहे हैं कि वह नशे के खिलाफ गंभीर हैं तो यह सिर्फ एक दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं माना जा रहा?
पंजाब में जिस तरह से नशे के दलदल में धसकर वहां की युवा पीढी बर्बाद हुई और इस नशे से जिस तरह से सरकारें भी आवाम के निशाने पर रही वह किसी से छिपा नहीं है। पंजाब की तर्ज पर उत्तराखण्ड के कुछ जिलों में जिस तरह से नशा माफियाओं ने अपना बडा जाल बिछाकर युवा पीढी को नशे के मकडजाल में फंसा दिया है वह उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य के लिए काफी घातक सिद्ध हो रहा है? उत्तराखण्ड में वर्षों से नशा माफियाओं पर नकेल लगाने का पुलिस महकमा ऑपरेशन चला रहा है लेकिन नशा तस्करी में तिनकाभर भी कोई कमी आ रही हो ऐसा अब तक तो दिखाई नहीं पड रहा है? उत्तराखण्ड के कुछ जिलों में जिस तरह से नशे का काला व्यापार उफान पर है वह राज्य सरकार के लिए काफी चिंता का विषय है क्योंकि कुछ पहाडी जिलों में भी नशा तस्करों ने अपना नेटवर्क इतना बुलंद कर लिया है कि पुलिस महकमा उस नेटवर्क को भेद पाने में सिर्फ नाम मात्र के लिए ही सफल दिख रहा है? उत्तराखण्ड में नशे के खिलाफ पुलिस के कुछ अफसर अकसर रैलियां और कार्यक्रम आयोजित कर युवा पीढी को नशे से दूर रखने के लिए उन्हें ज्ञान बांटते आ रहे हैं लेकिन पुलिस अफसरों के इस ज्ञान का काफी युवा पीढी में कोई असर दिखाई दे रहा हो ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा? हैरानी वाली बात है कि राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखण्ड को 2०25 तक ड्रग फ्री उत्तराखण्ड बनाने का संकल्प लिया है लेकिन कुछ जिलों में उनके इस संकल्प पर पुलिस के ही कुछ लोग ग्रहण लगाते हुए नजर आ रहे हैं? उत्तराखण्ड की राजधानी में जहां सारी सरकार, शासन, प्रशासन व पुलिस के आला अफसर मौजूद हैं अगर वहां के देहात और शहरी क्षेत्रों में नशे का काला कारोबार थम नहीं रहा है तो यह सिस्टम का ही फेलियर माना जा रहा है? शहर के कुछ इलाकों में नशा माफियाओं और नश्ेाडियों का इतना बडा आतंक हो रखा है कि उसको लेकर काफी परिवार डरे और सहमें हुये हैं और उनके मन में इस बात को लेकर भय है कि अगर उन्होंने अपने घर के आसपास नशा माफियाओं और नशेडियों को भगाने का साहस दिखाया तो कहीं उनके सामने अपने परिवार को बचाने का एक बडा संकट आकर न खडा हो जाये? ‘क्राईम स्टोरीÓ को पिछले कुछ दिनों से एक इलाके के कुछ लोग और कुछ महिलायें यह दर्द बयां कर रही हैं कि उनके घर के आसपास नशा माफियाओं और नशेडियों का हुजूम शाम ढलते ही लग जाता है और पुलिस का एक सिपाही भी उनके इलाके में यह झांकने के लिए नहीं आता कि वहां मौजूद नशा माफियाओं और नशेडियों को खदेड दें। चंद महिलाओं ने तो यहां तक कहा कि उन्होंने एक-दो बार पुलिस के एक-दो अफसरों को भी अपने इलाके में नशा माफियाओं और नशेडियों के बारे में जानकारी दी लेकिन किसी भी अधिकारी ने इतनी जहमत नहीं उठाई कि वह उनके इलाके में पुलिस के एक सिपाही को ही भेज दें। एक महिला ने यहां तक आरोप लगाया कि उन्होंने दो-तीन बार पुलिस के एक अफसर को भी फोन किया लेकिन फोन की बैल जाने के बाद अफसर ने उस कॉल को ही डायवर्ड कर दिया जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिस के कुछ अफसर और थानेदार मुख्यमंत्री के नशामुक्त उत्तराखण्ड के सपने पर किस तरह से ग्रहण लगा रहे हैं?

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