विधानसभा भर्तियों में फिर शुरू हुआ संग्राम!

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड मंे विधानसभा के अन्दर बैकडोर से हुई भर्तियों को लेकर जब राज्य के अन्दर भूचाल मचा तो राज्य के मुख्यमंत्री ने आगे आकर विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर राज्य बनने के बाद से विधानसभा में हुई सभी भर्तियांे की जांच कराने की मांग की थी जिस पर विधानसभा अध्यक्ष ने कोटिया कमेटी गठित कर एक माह के भीतर भर्ती मामले की जांच के लिए नियुक्त किया था जिसके बाद कोटिया कमेटी ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल व सरकार में शामिल मौजूदा कैबिनेट मंत्री व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल के कार्यकाल में तदर्थ हुई भर्तियों को अवैध मानकर उसकी रिपोर्ट विधानसभा अध्यक्ष को सौंपी थी। विधानसभा अध्यक्ष ने दोनो पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के कार्यकाल में हुई सैकडों भर्तियों को निरस्त कर दिया था जिसके बाद विधानसभा से निकाले गये कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था जहां एकल बैंच ने कर्मचारियों को राहत दी थी लेकिन डबल बैंच मंे मामला जाने के बाद विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को सही करार दिया गया और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी विधानसभा में नियमों को ताक पर रखकर की गई भर्तियांे को अवैध करार देते हुए विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को ठीक बताया जिसके बाद से अब कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेता सरकार में शामिल मंत्री व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल को मंत्रिमण्डल से बर्खास्त किये जाने की मांग को लेकर आक्रामक रूख अपनाये हुये हैं। बहस चल रही है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने भी यह तय कर दिया कि विधानसभा में हुई भर्तियां अवैध थी तो फिर सरकार में शामिल मंत्री व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष को मंत्रिमण्डल से बाहर क्यों नहीं किया जा रहा? अब विधानसभा भर्ती घोटाले में उत्तराखण्ड एक और जांच की मांग कर रहा है जिससे कि इस बात से पर्दा उठ सके कि इन भर्तियों में कौन-कौन सफेदपोश और दलाल शामिल थे जिन्होंने इन भर्तियांे को कराने में कोई बडा खेल पर्दे के पीछे रहकर खेला था?
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन पर काम कर रहे हैं और उत्तराखण्ड में बाइस सालों से फैले भ्रष्टाचार व घोटालों का अंत करने के लिए उन्होंने संकल्प ले रखा है। मुख्यमंत्री ने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई शुरू की तो उन्हें शिकायत मिली कि विधानसभा में 2021 में तदर्थ नियुक्तियां अवैध रूप से की गई थी यह शिकायत आने के बाद मुख्यमंत्री ने आगे आकर राज्य बनने के बाद से विधानसभा में हुई सभी नियुक्तियों की जांच के लिए विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा था जिस पर विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खण्डूरी ने तत्काल डीके कोटिया के नेतृत्व में तीन रिटायर्ड सीनियर अफसरों की कमेटी गठित कर उन्हें एक माह में अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा था। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट समय से पहले ही विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी और उसके बाद तदर्थ व उपनल से हुई लगभग ढाई सौ से ज्यादा भर्तियांे को अवैध करार दिया था और कहा था कि इन भर्तियांे में नियमो का पालन नहीं किया गया है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल व प्रेमचंद अग्रवाल के कार्यकाल मंे हुई नियुक्तियों को अवैध करार दिया था जिसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खण्डूरी ने दोनो पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के कार्यकाल मंे हुई नियुक्तियों को रद्द कर दिया था। इस मामले में उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को सही करार दिया है जिसके बाद लगभग ढाई सौ कर्मचारी सडक पर आ गये हैं। सवाल यह उठ रहा है कि विधानसभा में दो पूर्व विधानसभा अध्यक्षांे के कार्यकाल मंे हुई नियुक्तियांे के मामले में तो धुंध हट गई है और साफ हो गया है कि नियुक्तियां तदर्थ नियमों का पालन नहीं किया गया था। अब उत्तराखण्ड के अन्दर यह आशंकायें भी पनप रही हैं कि इन भर्तियांे में भाई-भतीजावाद और पैसे का लेनदेन भी हो सकता है और चर्चा यहां तक है कि कुछ कर्मचारियांे से तो एडवांस मंे चैक भी लिये गये थे? उत्तराखण्ड के घर-घर में यह चर्चाएं पहुंच रही हैं कि घोटाले में रिश्वतखोरी भी हुई है और इन नौकरियों की आड मंे कुछ लोगों ने पर्दे के पीछे रहकर दलाली का खेल भी खेला था? अब सवाल यह है कि विधानसभा से हटाये गये काफी कर्मचारी ऐसे होंगे जो अपना घर बसा चुके होंगे और अपनी नौकरी से वह परिवार का पालन पोषण कर रहे होंगे उनको निकाले जाने का एक पाठ तो खत्म हो गया लेकिन उनके चेहरों से कब पर्दा हटेगा जिन्होंने इन भर्तियों में दलाली का सम्भवतः खेल खेला था? यूकेएसएसएससी से हुई भर्तियांे से तो एसटीएफ ने पर्दा हटा दिया लेकिन चार दर्जन से अधिक लोगों की गिरफ्तारियां भी हुई लेकिन विधानसभा में हुई दो पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के कार्यकाल में भर्तियों को अंजाम दिलाने वाले असली दोषियों के चेहरे से भी पर्दा उठना जरूरी हो गया है? उत्तराखण्ड में यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि जब यूकेएसएसएससी से हुई भर्तियों की जांच कराकर उसमें दोषियों के खिलाफ एक्शन हो रहा है तो फिर विधानसभा में दो पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के कार्यकाल में अवैध रूप से हुई भर्तियों की जांच के लिए कब किसी एजेंसी को विधानसभा अध्यक्ष जांच सौपेंगी? चर्चा यहां तक है कि कुछ लोगों ने सम्भवतः कर्जा लेकर भी नौकरी पाई हो सकती है और इसमें कुछ दलाल भी यूकेएसएसएससी की तरह शामिल हो सकते हैं जिन्होंने पैसा लेकर नौकरियां दिलाने का काम किया था? अब राज्य के अन्दर यह बहस चल रही है कि विधानसभा अध्यक्ष को इन अवैध भर्तियों का सच सामने लाने के लिए स्वतः संज्ञान लेते हुए एक और जांच कमेटी बनाकर यह सच सामने लाना चाहिए कि इन भर्तियों में सिर्फ भाई-भतीजावाद ही अपनाया गया या फिर इन भर्तियों में भ्रष्टाचार का भी खेल खेला गया था?

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