देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखण्ड की चंपावत विधानसभा में होने वाले उपचुनाव की तिथि नजदीक आ चुकी है। वैसे तो उपचुनाव लड़ रहा प्रत्याशी अपना पूरा जोर लगाए हुए लेकिन हवा की रूख किसकी तरफ है इसका अंदाजा चंपावत से सैंकड़ों किमी दूर बैठे लोग भी लगाने लगे है। माना जाता है कि चुनाव में विजयश्री उसे ही प्राप्त होती है जिसकी लहर हो। बात करें उदाहरण की तो वर्ष 2०14 के आम चुनाव को ही ले लीजिए जिसमें कि तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और मौजूदा समय में भारत राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष नरेन्द्र मोदी की ऐसी लहर चली थी कि उनके प्रभाव से विपक्ष सिर्फ नाम मात्र का रह गया था। ऐसा ही एक लहर वर्ष 2०19 में भी देखने को मिली थी जिसमें कि सिर्फ तारीख और आंकड़ों का ही फेर हुआ था जबकि प्रभाव तब भी उनका था और इस बार भी उन्हीं का रहा था, जिसकी बदौलत भाजपानीत एडीए सरकार ने लगातार दूसरी बार सत्ता संभाली थी। चंपावत विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसी ही लहर का अक्स देखने को मिल रहा है जोकि राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नाम की चलती हुई महसूस हो रही है। विधानसभा क्षेत्र की आवाम का मानना है कि अब भाजपा प्रत्याशी और सूबे के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के तेज से ही अपना चंपावत चमकेगा। अधिकांश आवाम इस बात को लेकर मन बना चुकी है कि यदि अपने क्षेत्र में विकास के रथ को सरपट दौड़ाना है तो पुष्कर सिंह धामी को विजयी बनाना ही होगा। राजनीति के जानकारों कीे माने तो वह भी इसी ओर इशारा कर रहे है कि सीएम धामी चंपावत विधानसभा से एक अप्रत्याशित जीत हासिल करेंगे। सीएम धामी के साथ चुनाव प्रचार में उनकी धर्मपत्नी कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है जोकि उनकी जीत को और पक्का कर रहा है। लेडी पुष्कर के साथ स्थानीय महिलाओं के हुजूम को देखकर विरोधी पस्त नजर आ रहे है। जैसे-जैसे चुनाव की तिथि समीप आ रही है प्रत्याशियों से लेकर समर्थकों के मन में हलचल तेज हो रही है कि आखिर परिणाम की गेंद किसकेे पाले में जाकर गिरेगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि किसका आंकलन सही साबित होता है?
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड में वर्ष 2०17 में हुए विधानसभा चुनाव से पूर्व सूबे में सत्ता कांग्रेस के पास थी। हालांकि उस दौरान भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर समूचे देश में चल रही थी और इसका फायदा भाजपा को उत्तराखण्ड में भी मिला और राज्य के इतिहास में पहली बार उसने अकल्पनीय प्रचंड बहुमत हासिल किया। हालांकि प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद भी अगले लगभग चार सालों में भाजपा के सत्ताधारियों ने तोहफे मे मिली इस जीत को सही ढंग से नहीं भुुनाया। सत्ता समाप्त होने से कुछ माह पूर्व भाजपा हाईकमान ने एक स्ट्रोक खेलते हुए पुष्कर सिंह धामी को राज्य की सत्ता की कमान सौंपी। पार्टी हाईकमान का यह स्ट्रोक एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ और सीएम पुष्कर सिंह धामी ने अपनी कार्यकुशलता से भाजपा को राज्य में एक बार फिर से फर्श से अर्श पर पंहुचा दिया। जैसे-जैसे सरकार का कार्यकाल समाप्त होने जा रहा था, वैसे-वैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे थे। चुनाव को समीप आते देख जहां और राजनीतिक दल इस दुविधा में थे कि आखिर चुनाव का परिणाम क्या होगा, वहीं भाजपा हाईकमान के नेता काफी निश्चिंत नजर आ रहे थे। इस निश्चिंत्ता का प्रमुख कारण था कि इस चुनाव में उनके पास पीएम मोदी के साथ सीएम धामी का चेहरा भी था। भाजपा की लहर उत्तराखण्ड के अधिकांश क्षेत्रों में देखने को मिल रही थी और इसका परिणाम यह रहा कि भाजपा को एक बार फिर प्रचंड बहुमत हासिल हुआ। चुनाव में सबकुछ ठीक रहा लेकिन थोड़ा दुर्भाग्य यह रहा सीएम धामी खुद अपनी सीट से चुनाव हार गए। यह शिकस्त तो मानो भाजपा के लिए एक परंपरा की तरह हो चली है कि जिसके नाम पर चुनाव लड़ा जाता है, वह खुद ही चुनाव हार जाता है या उस प्रत्याशी का हरा दिया जाता है। हालांकि पार्टी हाईकमान ने एक बार फिर पुष्कर को ही उत्तराखण्ड में सत्ता की कमान सौंपने का मन बनाया और इसके बाद पार्टी के अंदर कई विधायकों ने सीएम के लिए अपनी सीट का त्याग करने की पेशकश रखनी शुरू कर दी। अंतत: यह तय हुआ कि चंपावत विधानसभा से सीएम उपचुनाव लड़ेंगे। अब जबकि उपचुनाव की तिथि नजदीक आ चुकी है तो चुनावी माहौल गर्मा रखा है। सीएम धामी और उनकी धर्मपत्नी लगातार जनसंपर्क करने में जुटे हुए है। भाजपा के कार्यकर्ताओं ने भी अपने सीएम को विजयश्री दिलाने के लिए दिन रात एक कर रखा है। चंपावत में चुनावी माहौल को देखकर साफ अंदाजा लगाया जा रहा है कि वहां के आवाम को झुकाव किसकी ओर है। हालांकि माना जा रहा है कि चंपावत की जनता अपने क्षेत्र के विकास को मद्देनजर रखते हुए पुष्कर सिंह धामी के पक्ष में मतदान करने का मन बना चुकी है। अब देखने वाली बात यह होगी अंदाजों और कयासों की यह लहरें किसकी नैय्या को पार लगाती है?
