संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के इतिहास में जो कभी नहीं हो पाया, उसको करके दिखाने वाली शख्सियत और कोई नहीं बल्कि इस पहाड़ी प्रदेश के मुखिया ही है जिन्होंने ने ऐतिहासिक मिथकों को धाराशाई करते हुए लगातार दूसरी बार राज्य की सत्ता की कमान अपने हाथों में संभाली है। पुष्कर सिंह धामी को लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी हाईकमान यह साबित कर दिया है कि वह राज्य की जनता के मन की बात को किस गहराई से समझती है। हालांकि, पुष्कर के सीएम बनने की राह इतनी आसान भी नहीं थी। यह तो सर्वविदित है कि भाजपा में चंद भीतरघातियों की कमी नहीं और इसका उदाहरण समय समय पर सामने भी आता रहा है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण उस समय नजर आया था जब ‘खण्डूरी है जरूरीÓ के नारे को लेकर भाजपा वर्ष 2012 की चुनावी मैदान में उतरी थी लेकिन ऐसे ही चंद कथित भीतरघातियों की कारसतानी से खुद भुवन चंद्र खण्डूरी को ही चुनावी जंग में हार का सामना करना पड़ा था। ठीक वैसा ही कुछ हाल ही में हुए चुंनाव में देखने को मिला जब अपने बूते पर पूरे राज्य में भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाने वाले चेहरे को अपने ही चुनावी क्षेत्र में हार का समाना करना पड़ा। प्रचंड जीत हासिल करने के बाद भाजपा हाईकमान ने एक बार फिर पुष्कर सिंह धामी पर विश्वास जताते हुए उन्हें प्रदेश की कमान सौंपी। चर्चाओं का बाजार गर्म है की सीएम बनने के बाद भी पुष्कर सिंह धामी की मुश्किलों को कम न होने देने के लिए यह चंद भीतरघाती कोई कसर छोडऩे को तैयार नहीं है। बातें तो यहां तक उठ रही है कि राजनेताओं को एक समूह और नौकरशाहों का एक कॉकस ऐसे जयचंदों को को तैयार करने में जुटा हुआ है जो सरकार के मुखिया को हर कदम पर धाराशाई करने को तैयार रहे? ऐसे में अब देखने वाली बात यह होगी कि सीएम साहब इन जयचंदों से कैसे निपटेंगे और उत्तराखण्ड में इतिहास रचने वाले, राज्य की जनता के सामने मिसाल पेश करने में कामयाब किस तरह हो पाएंगे?
गौरतलब है कि पिछले कार्यकाल में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने अल्प समय के कार्यकाल में उत्तराखण्ड को अनेकों सौगातों से नवाजा था। उत्तराखण्ड को विकास की धारा से जोड़ते हुए उन्होंने कई ऐसे काम किए हैं जिनकी संभवत: कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। राज्य के कई विभागों में जो भर्तियां पिछले लंबे समय से अधर में लटकी हुई थी, उनको मुख्यमंत्री धामी ने हरी झंडी दिखाई थी। पुलिस विभाग में भर्तियोंं को लेकर पिछले लंबे समय अल्प विराम लगा हुआ था, जिसको हटाकर मुख्यमंत्री धामी ने युवाओं के लिए मार्ग प्रशस्त किया था। प्रदेश के प्रत्येक तबके लिए विकासपूर्ण नजरिया रखने वाले मुख्यमंत्री धामी ने जहां खुद की शख्सीयत को मजबूत और हरदिल अजीज बनाया था वहीं उनकी कार्यशैली उनकी पार्टी के लिए भी संजीवनी का कार्य निरंतर कर रही है। सीएम धामी ने पिछली बार सत्ता संभालने के बाद से ही सिर्फ और सिर्फ इसी बात पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया हुआ है कि कैसे उत्तराखण्ड भारत का सर्वश्रेष्ठ राज्य बनाया जाए और अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सीएम धामी की इसी विकासपरक सोच पर विश्वास जताते हुए पार्टी हाईकमान ने उनके चुनाव में हारने के बावजूद, उन्हें ही सत्ता की कमान सौंपी। सीएम पद के चेहरे का चुनाव हारना कोई साधारण बात नहीं है और वो भी उत्तराखण्ड जैसे कब आबादी वाले राज्य में, इसके पीछ कोई षडय़ंत्र न हो, ऐसा तो सोचना भी असंभवव से प्रतीत होता है? हालांकि, चुनाव के दौरान हुए कथित षडय़ंत्रों को भाजपा हाईकमान में औंधे मुंह गिरा दिया और एक बार फिर से पुष्कर सिंह धामी को सीएम बना दिया। सीएम धामी की आगामी पांच साल की राह आसान नहीं मानी जा रही है क्योंकि इस बात की चर्चाएं तेज हो रखी है कि आज भी वह चंद जयचंदों से घिरे हुए है, जो उनकी राह में कांटें बिछाने का काम बड़ी नाटकीय अंदाज में करने की साजिशें रच रहे हैं? ऐसे में प्रदेश के तेजस्वी और युवा मुख्यमंत्री को इन जयचंदों से सावधान रहने की जरूरत है और उन्हें चिन्हित करके उनको कठोर दंड देना भी अतिआवश्यक है।
