देहरादून। उत्तराखण्ड का यह इतिहास रहा है कि जब भी यहां नई सरकार बनी हो, उसके मंत्रीमंडल के विस्तार से पहले ही विभागों में लगी कुछ चुनिंदा कुर्सियां आरक्षित हो जाती है। इन कुर्सियों के आरक्षण का उल्लेख न तो संविधान में है और न ही किसी और अभिलेखों में। फिर भी यह होते हैं। पिछले दो दशकों से तो ऐसा ही होता आ रहा है भले ही वह अंदरखाने हो। फिज़ा जो इस समय उत्तराखण्ड में बह रही है उसको यदि सूक्षम रूप से देखें तो ऐसा आभास हो रहा है कि कुर्सियों का यह आरक्षण अब समाप्त हो जाएगा और जो अभ्यर्थी इन कुर्सियों के योग्य होंगे उनके ही यह कुर्सी मिलेगी। समझसकते है कि यह एक दिवास्वपन जैसा लग रहा होगा लेकिन यह कार्रवाई जल्द ही धरातल पर जनता को उतरती हुई दिख सकती है? उत्तराखण्ड की मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के व्यक्तित्व के विषय में शायद ही कोई अनभिज्ञ होगा। मधुर भाषी, सरल स्वभाव, विलक्षण व्यक्तित्व, यह वह अलंकार है जिनसे वह सुशोभित है, लेकिन यह प्रतिभा उनकी मुख्यमंत्री के तौर स्वभाविक है क्योंकि वह जनता के सीएम है। एक सीएम का कर्तव्य होता है कि वह सामाजिक तौर पर जितना सरल होता है उसे राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर उतना ही सख्ता होना पड़ता है। इन दोनों पहलूओं में सीएम धामी इतने सटीक बैठते है जितना कि उत्तराखण्ड के इतिहास में कोई नहीं बैठा। एक परंपरा के तौर पर उत्तराखण्ड में चंद सिंडिकेट किसी भी सरकार में अपने वर्चस्व को दर्शाते हुए अपने करीबियों को ‘सेटÓ करने के खेल में जुट जाते रहे है। अब परंपरा तो बनती ही टूटने के लिए है, तो अब इस परंपरा को तोडऩे के लिए उत्तरखण्ड की जनता के चहेते सीएम पुष्कर सिंह धामी खुद आगे आ गए है। अपनी मधुर भाषाशैली से वह बहुत कुछ कह जाते है। कुछ लोग उनकी मधुरता को समझते है तो कुछ उनके कथन के भावार्थ को। उत्तरखण्ड में चल रहे सिंडिकेट के खिलाफ जो बिगुल उन्होंने बजाया उसकी गूंज वैसे तो कईयों के कानों में पंहुची होगी लेकिन उनके कानों में कुछ ज्यादा जोर से बजी होगी जो इस सिंडिकेट का हिस्सा हैं। सीएम धामी के कथन को यदि एक हुंकार समझा जाए और उनके व्यक्तव्य के भावार्थ को समझाा जाए तो यह साफ हो जाता है कि माना वह कह रहे हो ‘सिंडिकेट गेट आउट…Ó
राज्य कोई भी हो, उसके सरकारी विभागों में तैनाती के लिए नियुक्तियां निकाली जाती है। निविदा के माध्यम से परिक्षार्थी फार्म भर्तें है और अपनी बारी की प्रतीक्षा करते है। हालांकि उत्तराखण्ड में पिछली सरकारों के कार्यकाल में यह देखने को मिलता रहा है कि निविदाएं तो निकलती थी, लेकिन निविदाओं के आधार में उपयोगी परिक्षार्थी का चयन नहीं हो पाता था, आखिर क्यों? उसका मुख्य कारण यह नजर आ रहा है कि निविदाएं तो मात्र बहाना होती है। दरअसल, जिन लोगों को नियुक्त किया जाना है वह तो पहले ही तय हो चुके है। इस सिंडिकेट में चंद मीडियाकर्मियों का बड़ा हिस्सा दिखाई देता है जोकि अपने चहेतों को तो निविदा निकलने से पहले ही सूचीबद्ध कराने में सफलता प्राप्त करने में सफल होते आए हैं, साथ ही साथ किसी अपने करीबी या फिर किसी विभाग में तैनात किसी कर्मचारी के संबंधी को भी मात्र मिठाई के डिब्बे के लिए नियुक्ति दिलाने में या तो सफल हो जाते थे या फिर उसे दोबारा कोशिश करने का आश्वासन दे देते थे। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि ऐसे मीडियाकर्मियों की वजह से पिछले कई सरकारों की छिछालेधर हुई है। यह मीडियाकर्मी ऐसे है तत्व है जो खुद को और अपने संस्थान को तो बदनाम करते ही हैं। साथ ही साथ पत्रकारिता जगत से जड़े सच की राह पर अडिग पत्रकारों को भी अपनी सूची में सम्मीलित कर लेते है। पत्रकारिता एक धर्म है, और जो इसके अनुपालन में कोताही बरतने की चेष्टा करें, उसे तुरंत बाहर करना चाहिए। जैसा कि अब राज्य के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने मिशन छेड़ा है। मुफ्त की रेवडिय़ां बांटने वाले सिंडिकेट से जुड़ा जो भी अधिकारी, पत्रकार, बड़ा नौकरशाह होगा, उसके लिए उनका एक ही संदेश है ‘गेट आउट….Ó। उनका यह संदेश भले ही सुनने में न आया हो लेकिन राजनीति के जानकार उनके हाव भाव को अब तो समझ ही चुके है कि असल में कहना क्या चाहते है। उत्तराखण्ड को सशक्त राज्य बनाने के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है और वह सख्त कदम किस कलात्मकता के साथ उठाने है, यह राज्य के मुख्यमंत्री अच्छी तरह से जानते है। और जाने भी क्यों न, आखिर मित्र भी तो पीएम मोदी के हैं ………….
