सदन में शोर, सरकार ने निपटाया कामकाज
डेढ़ दिन में सिमटा सदन, 7044 करोड़ का बजट पास
प्रमुख संवाददाता
भराड़ीसैंण। लोकतंत्र के सबसे बड़े मंच पर जनता के सवाल शोर में दब गए और सात हजार करोड़ रुपये से अधिक का अनुपूरक बजट बिना चर्चा के पारित हो गया। विधानसभा चुनाव से पहले धामी सरकार के अंतिम विधानसभा सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष की सियासी खींचतान के बीच महज डेढ़ दिन में सदन की कार्यवाही सिमट गई। सवालों की जगह नारे गूंजे और बहस की जगह ध्वनिमत से बजट व विधेयक पारित होते चले गए।
आज सदन की कार्यवाही शुरू होते ही कांग्रेस विधायकों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अंकिता भंडारी प्रकरण, भ्रष्टाचार के आरोप, कानून व्यवस्था, मेडिकल सीटों और नकल माफिया जैसे मुद्दों पर विपक्ष वेल में उतर आया। हंगामा इतना बढ़ा कि विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी को दो बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। सवालों से घिरी सरकार या हंगामे में उलझा विपक्ष? भराड़ीसैंण सत्र ने दोनों पक्षों की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए। कांग्रेस जनहित के मुद्दों पर जवाब मांगती रही, जबकि सरकार ने हंगामे के बीच 7044 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट और कई विधेयक पारित करा लिए। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी धनराशि के बजट पर सदन में विस्तृत चर्चा क्यों नहीं हो सकी? जनता के पैसे के इस्तेमाल पर सवाल-जवाब आखिर कब होंगे?
हंगामे के कारण प्रश्नकाल में महज एक सवाल लिया जा सका। नियम 58 के तहत कुछ सूचनाएं स्वीकार हुईं। कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने हरिद्वार में भू-कटाव से संबंधित सवाल पर जवाब दिया। वहीं विधानसभा अध्यक्ष ने मानव-वन्यजीव संघर्ष के पीड़ितों का लंबित भुगतान एक महीने में करने के निर्देश दिए। दोपहर करीब 1रू10 बजे राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के बाद सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। भराड़ीसैंण से सबसे बड़ा सवाल यही निकलाकृजब सदन में चर्चा ही नहीं होगी, तो सरकार से जवाब कौन मांगेगा और जनता के मुद्दों पर बहस कहां होगी? सरकार का काम बजट पारित कराना है, विपक्ष का दायित्व सवाल उठाना। लेकिन जब दोनों के बीच टकराव में सदन की कार्यवाही ही सिमट जाए, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सत्ता ने बजट पारित कराया, विपक्ष ने विरोध दर्ज कराया, लेकिन जनता के हिस्से की बहस अधूरी रह गई।


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