सत्ता के भीतर कौन रच रहा धामी सरकार गिराने की साजिश

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उर्मिला के आरोपों से गर्माई सियासत
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। मुख्यमंत्री जिस शैली से सरकार चला रहे हैं उससे आम जनमानस के मन में एक भाव है कि वह राज्य के विकास को लेकर एक नई उडान भर रहे हैं और उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो बिगुल बजा रखा है उसके चलते पार्टी के ही कुछ विभीषण अपनी रडार पर लेते रहे हैं और उनकी सरकार को पहले भी ऐसी साजिश रचकर अस्थिर करने की कोशिश हो चुकी है लेकिन मुख्यमंत्री ने ऐसी साजिशों को हमेशा बेनकाब करने के लिए खुद मोर्चा संभाल रखा है। अब उर्मिला सनावर ने धामी सरकार को अस्थिर करने का दम भरकर उत्तराखण्ड की सियासत में एक बडा भूचाल मचा दिया है। मीडिया के सामने उर्मिला ने हुंकार भरी कि सत्ताधारी ही धामी सरकार को गिराना चाहते हैं जिससे सवाल पनप रहे हैं कि आखिरकार धामी सरकार के खिलाफ ऐसा घिनौना षडयंत्र आखिर कौन रच रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर ऐसा बयान सामने आया है, जिसने सत्ता के गलियारों में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े विवादित बयानों के कारण चर्चा में आईं अभिनेत्री उर्मिला सनावर ने अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार को अस्थिर करने की कथित साजिश का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि सरकार गिराने की कोशिश विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे कुछ लोग ही करना चाहते हैं। यदि इस आरोप के पीछे कोई ठोस तथ्य हैं तो यह बेहद गंभीर मामला है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उर्मिला सनावर किस आधार पर इतना बड़ा दावा कर रही हैं? आज सीबीआई कोर्ट में हुई कथित सुनवाई के संबंध में सामने आई जानकारी के अनुसार, उर्मिला सनावर और पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ पेश हुए तथा दोनों ने नार्को टेस्ट कराने पर सहमति जताई। उर्मिला ने भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं का भी नार्को टेस्ट कराने की मांग की है। हालांकि, इस अदालती घटनाक्रम की आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है।
उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व वाली सरकार को लेकर उर्मिला सनावर का यह आरोप इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने सीधे सत्ता के भीतर से ही सरकार को अस्थिर करने की कथित कोशिशों की बात कही है। सवाल उठता है कि क्या उनके पास ऐसे कोई दस्तावेज, बातचीत या अन्य प्रमाण हैं, जिनसे उनके आरोपों की पुष्टि हो सके? यदि हैं तो उन्हें जांच एजेंसी अथवा सक्षम न्यायिक मंच के सामने क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े कथित ऑडियो ने पहले ही प्रदेश की राजनीति में कई सवाल खड़े कर रखे हैं। अब सरकार गिराने की कथित साजिश का आरोप सामने आने से इस प्रकरण में एक नया राजनीतिक पहलू जुड़ गया है। हालांकि, किसी सरकार को अस्थिर करने की साजिश और राजनीतिक असहमति के बीच बड़ा अंतर होता है। ऐसे में केवल बयान के आधार पर किसी व्यक्ति या नेता की भूमिका तय नहीं की जा सकती।
इस बीच सीबीआई की जांच भी महत्वपूर्ण मोड़ पर है। 23 अक्टूबर को नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए उर्मिला सनावर की स्वैच्छिक सहमति की पुष्टि करने के उद्देश्य से अदालत में पेशी निर्धारित की गई थी। पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ ने भी नार्को टेस्ट कराने की सहमति जताने की बात कही है। अब सवाल केवल इतना नहीं है कि उर्मिला सनावर किन नेताओं पर संदेह जता रही हैं। सवाल यह भी है कि उनके आरोपों के पीछे कितनी सच्चाई है और क्या जांच एजेंसियों के सामने कोई ऐसा प्रमाण आया है, जो इन दावों को मजबूती दे सके। मुख्यमंत्री धामी की सरकार को लेकर लगाए गए आरोपों पर संबंधित पक्षों का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड की सियासत में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सत्ता के भीतर वास्तव में कोई ऐसी गतिविधि चल रही है, जिसका दावा उर्मिला सनावर कर रही हैं, या फिर यह एक ऐसा राजनीतिक आरोप है, जिसे अभी प्रमाणों की कसौटी पर परखा जाना बाकी है? फिलहाल सरकार गिराने की कथित साजिश और उसमें किसी सत्ताधारी नेता की संलिप्तता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में इन आरोपों का सच सामने लाने के लिए ठोस साक्ष्य और निष्पक्ष जांच ही निर्णायक होंगे।

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