हुंकार में दिखा खुला संदेश

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किसी की गुलाम नहीं खाकी
खाकी बेदाग होगी तो मासूमों को मिलेगा इंसाफ
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। खाकी बेदाग होनी चाहिए क्योंकि एक छोटे से छोटे इंसान को यह उम्मीद रहती है कि अगर उसके साथ कोई अन्याय हुआ तो खाकी उसका साथ देगी लेकिन उत्तराखण्ड में एक लम्बे अर्से से पुलिस के काफी अफसरों और दरोगाओं पर सत्ता के कुछ नेताओं के इशारे पर उनके विरोधियों का शिकार करने को लेकर जो दाग लगता रहा है उससे राज्य के अन्दर ऐसे अफसरों और दरोगाओं के कारण खाकी की छवि तार तार हुई है। जी 5 पर एक वेब सीरिज हुंकार आई है और यह सीरिज सत्य पर आधारित है। इसमें जिस तरह से एक बडे मायावी संत द्वारा एक नाबालिक के साथ किये गये बलात्कार के बाद सिस्टम ने मामले को दबाने का प्रपंच रचा लेकिन एक ईमानदार और दबंग पुलिस अफसर ने खाकी का इकबाल दिखाते हुए अपने महकमे से लेकर सिस्टम के बडे अफसरों को आईना दिखाते हुए बलात्कारी संत को दबंगता के साथ सलाखों के पीछे पहुंचाया उसे देखकर यह बहस जरूर चल उठी है कि अगर उत्तराखण्ड में भी खाकी का मान रखने के लिए वो पुलिस अफसर और दरोगा जो सत्ता के कुछ बडे नेताओं के इशारे पर कुछ भी कर गुजरने को तैयार दिखते हैं उन्हें यह सीरिज जरूर देखनी चाहिए कि खाकी किसी सिस्टम या राजनेता की गुलाम नहीं है।
खाकी पर लगा एक दाग सिर्फ किसी दरोगा या अफसर की वर्दी को मैला नहीं करता, उसकी छींटें पूरे पुलिस महकमे के इकबाल तक पहुंचती हैं। क्योंकि पुलिस कोई साधारण सरकारी विभाग नहीं है। गरीब, कमजोर और बेबस आदमी जब हर दरवाजे से निराश हो जाता है तो उसके पास आखिरी उम्मीद के रूप में कानून और पुलिस ही बचते हैं। वह थाने में इसलिए जाता है कि वहां उसका राजनीतिक कद नहीं पूछा जाएगा। यह नहीं देखा जाएगा कि उसकी पहुंच किस मंत्री, विधायक या रसूखदार व्यक्ति तक है। उसे उम्मीद होती है कि उसकी जेब खाली हो सकती है, उसकी कोई राजनीतिक पहचान नहीं हो सकती, लेकिन अगर उसके साथ अन्याय हुआ है तो खाकी उसके और ताकतवर के बीच कानून की दीवार बनकर खड़ी होगी। यही कारण है कि पुलिस पर राजनीतिक दबाव में काम करने का छोटा-सा आरोप भी मामूली नहीं होता। उत्तराखंड में भी समय-समय पर विपक्षी दलों, पीड़ित पक्षों और अन्य लोगों की ओर से कुछ पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक दबाव और पक्षपात के आरोप लगाए जाते रहे हैं। हर आरोप को सच मान लेना उचित नहीं और उसकी सत्यता जांच तथा प्रमाण से ही तय हो सकती है। लेकिन सवाल इससे भी बड़ा हैकृपुलिस की कार्रवाई ऐसी क्यों न हो कि सत्ता बदलने के बाद भी उसकी फाइल और उसकी नीयत दोनों पर सवाल न उठ सके?
इसी सवाल के बीर्च म्म्5 की वेब सीरीज ‘हुंकार’ खाकी, रसूख और सिस्टम की टकराहट को लेकर बहस छेड़ती है। एक प्रभावशाली संत से जुड़े नाबालिग के यौन उत्पीड़न के मामले और उसके आसपास खड़े ताकतवर तंत्र के बीच पुलिस अधिकारी को कानून के रास्ते पर खड़ा दिखाने वाली कहानी एक कड़ा संदेश देती हैकृवर्दी की परीक्षा तब नहीं होती जब सामने कमजोर अपराधी होय असली परीक्षा तब होती है जब सामने रसूख हो और पीछे से दबाव। फोन कितना भी बड़ा हो, कानून उससे बड़ा होना चाहिए। पुलिस अफसर की असली ताकत उसके मोबाइल में सेव नेताओं के नंबर नहीं होते। उसकी ताकत वह कानून है जिसे लागू करने की जिम्मेदारी उसके कंधों पर है। अगर किसी थाने की कार्रवाई इस आधार पर बदलने लगे कि फोन किसका आया है, शिकायतकर्ता किस राजनीतिक खेमे का है अथवा आरोपी की पहुंच कहां तक है, तो खतरा सिर्फ एक मुकदमे के कमजोर होने का नहीं रहता। उस व्यवस्था पर आम आदमी का भरोसा कमजोर होने लगता है जिसके हाथ में उसकी सुरक्षा सौंपी गई है। यहीं ‘हुंकार’ का सवाल उत्तराखंड के लिए भी प्रासंगिक हो जाता है। क्या किसी पुलिस अधिकारी के लिए सत्ता की नाराजगी कानून से बड़ी हो सकती है? क्या किसी दरोगा की कलम यह देखकर चलनी चाहिए कि सामने वाला सत्ता के करीब है या उससे दूर? और सबसे बड़ा सवालकृअगर एक सामान्य आदमी और एक बेहद प्रभावशाली व्यक्ति कानून के सामने खड़े हों तो क्या दोनों के लिए कानून की लाठी बराबर चलेगी? जवाब संविधान और कानून की भावना में साफ हैकृकानून के सामने समानता। सरकारें बदलती हैं, वर्दी की शपथ नहीं उत्तराखंड ने अपने गठन के बाद कई सरकारें देखी हैं। सत्ता के चेहरे बदलते रहे हैं और आगे भी बदलेंगे। यही लोकतंत्र है। लेकिन पुलिस की वर्दी हर सरकार के साथ अपना चरित्र नहीं बदल सकती।
आज सत्ता में बैठा व्यक्ति कल विपक्ष में हो सकता है और आज विपक्ष में बैठा व्यक्ति कल सरकार चला सकता है। ऐसे में पुलिस अगर राजनीतिक समीकरण देखकर काम करेगी तो हर सत्ता परिवर्तन के साथ उसकी निष्पक्षता कठघरे में खड़ी होगी। इसलिए खाकी की सबसे मजबूत ढाल राजनीतिक संरक्षण नहीं, उसकी निष्पक्षता है। पूरी पुलिस को कठघरे में खड़ा करना भी गलत यह तस्वीर का दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण पहलू है। उत्तराखंड पुलिस में हजारों अधिकारी और जवान ऐसे हैं जो कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी करते हैं। अपराधियों का पीछा करते हैं, नशा तस्करों के नेटवर्क तोड़ते हैं, आपदाओं में जान जोखिम में डालते हैं और कई बार बिना किसी प्रचार के सामान्य नागरिक की मदद करते हैं। इसलिए किसी अधिकारी पर लगे आरोप को पूरी उत्तराखंड पुलिस के चरित्र से जोड़ देना न तो तथ्यसम्मत होगा और न न्यायपूर्ण। लेकिन इसी वजह से महकमे की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यदि किसी पुलिस अधिकारी पर राजनीतिक दबाव में काम करने का गंभीर आरोप लगता है तो उसकी निष्पक्ष जांच केवल शिकायतकर्ता के लिए जरूरी नहीं हैकृयह उन हजारों ईमानदार पुलिसकर्मियों के सम्मान के लिए भी जरूरी है जिनकी वर्दी पर कोई दाग नहीं है। सितारे कंधे पर हैं, जवाबदेही कानून के प्रति है एक पुलिस अधिकारी कितना शक्तिशाली है, इसका फैसला उसके कंधे पर लगे सितारों से नहीं होना चाहिए। उसका कद उस दिन तय होता है जब सामने ताकतवर आदमी खड़ा हो और वह फिर भी कानून की किताब खोलकर फैसला करे। यही खाकी का इकबाल है। यही पुलिस की प्रतिष्ठा है और यही वह भरोसा है जिसके सहारे एक गरीब आदमी थाने में जाकर कुर्सी पर बैठे अधिकारी से कह पाता हैकृ“साहब, मेरे साथ अन्याय हुआ है।”उस एक वाक्य के बाद पुलिस के सामने सिर्फ एक पहचान बचनी चाहिएकृपीड़ित और कानून। न उसका राजनीतिक दल। न उसकी हैसियत। न सामने वाले की पहुंच। ‘हुंकार’ पर्दे पर है, सवाल असली है। वेब सीरीज खत्म हो जाएगी। स्क्रीन बंद हो जाएगी। किरदार पर्दे से उतर जाएंगे। लेकिन उसके बहाने खड़ा हुआ सवाल पुलिस व्यवस्था के सामने बना रहेगा। जब सत्ता, रसूख और कानून आमने-सामने हों तो खाकी किसके साथ खड़ी होगी?
इस सवाल का जवाब किसी भाषण से नहीं मिलेगा। जवाब थानों में लिखी जाने वाली एफआईआर, विवेचना की निष्पक्षता, गिरफ्तारी की कार्रवाई और पुलिस अधिकारियों के फैसलों से मिलेगा। क्योंकि लोकतंत्र में पुलिस की वर्दी किसी मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, राजनीतिक दल या विपक्ष की निजी ताकत नहीं होती। खाकी सिर्फ कानून की है। और जिस दिन आखिरी पंक्ति में खड़ा आदमी बिना डर के यह कह सके कि “मेरे पास कोई पहुंच नहीं, लेकिन मुझे पुलिस पर भरोसा है,” उसी दिन समझिए खाकी का इकबाल वास्तव में बुलंद है।

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