संदिग्ध एससी-एसटी प्रमाण पत्रों पर शासन घृतराष्ट्र

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सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी कोटा क्यों, एससी-एसटी प्रमाण पत्रों की भी हो जांच
वर्ष 2000 के बाद जारी एससी-एसटी प्रमाण पत्रों की जांच को बने एसआईटी
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे से जुड़े कथित फर्जी प्रमाणपत्रों की जांच के बीच अधिवक्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने प्रदेश में संदिग्ध अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) प्रमाणपत्रों की भी राज्यव्यापी जांच कराने की मांग की है। उन्होंने इसके लिए स्वतंत्र उच्चस्तरीय विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने और वर्ष 2000 के बाद जारी प्रमाणपत्रों का चरणबद्ध सत्यापन कराने की मांग उठाई है।
नेगी ने कहा कि यदि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के प्रमाणपत्रों की जांच कराई जा सकती है तो मेडिकल, इंजीनियरिंग, उच्च शिक्षण संस्थानों और सरकारी सेवाओं में आरक्षण का लाभ लेने के लिए इस्तेमाल किए गए संदिग्ध एससी-एसटी प्रमाणपत्रों की जांच भी होनी चाहिए। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 तथा सुप्रीम कोर्ट के महाराष्ट्र राज्य बनाम मिलिंद मामले का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पहचान संबंधित राज्य के लिए लागू राष्ट्रपति की अधिसूचित सूची के आधार पर होती है। ऐसे में प्रमाणपत्रों की जांच करते समय संबंधित अधिसूचित सूची और प्रमाणपत्र जारी करने के आधार बने अभिलेखों का मिलान किया जाना चाहिए। नेगी ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के नाम के साथ सिंह, कुमार, आर्य, वर्मा या अन्य उपनाम होने मात्र से उसके प्रमाणपत्र को संदिग्ध या फर्जी नहीं माना जा सकता। जांच का आधार यह होना चाहिए कि प्रमाणपत्र किस अधिसूचित जाति अथवा जनजाति के आधार पर जारी किया गया और संबंधित व्यक्ति की पात्रता के समर्थन में कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे।
नेगी ने सरकार से पूछा है कि वर्ष 2000 के बाद प्रदेश में कितने एससी-एसटी प्रमाणपत्र जारी किए गए और इनमें से कितनों का सत्यापन कराया गया। साथ ही इन प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल-इंजीनियरिंग संस्थानों, विश्वविद्यालयों, सरकारी विभागों, निगमों, बोर्डों, पुलिस और अन्य सेवाओं में कितने लोगों ने आरक्षण का लाभ लिया। उन्होंने प्रमाणपत्रों का सुरक्षित डिजिटल रजिस्टर तैयार करने और व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक किए बिना जिलेवार सत्यापन के आंकड़े जारी करने की भी मांग की। नेगी ने कहा कि यदि जांच में कोई प्रमाणपत्र आवश्यक अभिलेखों के बिना, गलत रिपोर्ट या नियमों के विपरीत जारी पाया जाता है तो प्रमाणपत्र धारक के साथ उसे जारी करने की प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए। उन्होंने सेवानिवृत्त उच्च न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में एसआईटी गठित करने, छह माह में प्राथमिक जांच पूरी करने और विधानसभा में श्वेतपत्र प्रस्तुत करने की मांग की है। नेगी ने कहा कि यह मांग आरक्षण के विरोध में नहीं बल्कि वास्तविक पात्र एससी-एसटी अभ्यर्थियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए है। जांच के दौरान वास्तविक लाभार्थियों का उत्पीड़न न हो और प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष एवं अभिलेख प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाए।

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