खंभो पर सीसीटीवी का जाल अपराध के वक्त निगरानी कहां
शहरों की तीसरी आंख का हिसाब कौन देगा
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में अपराधियों पर नजर रखने के लिए पुलिस महकमे में तीसरी आंख चप्पे-चप्पे पर लगाने का दौर शुरू कर रखा है लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात है कि जब जगह-जगह कैमरे लगे हुये हैं तो फिर किसी भी संगीन वारदात के बाद उस अपराध की फुटेज तलाशने के लिए पुलिस महकमे के लोग क्यों दुकानों और धरों में दस्तक देने के लिए आगे आते हैं। खंभो पर सीसीटीवी का जाल लेकिन अपराध के वक्त उसकी निगरानी क्यों शून्य हो जाती है यह एक सुलगता है। किसी भी वारदात के बाद निजी कैमरों का सहारा लिया जाता है तो फिर बहस यह चल उठी है कि खंभो पर लगे सरकारी सीसीटीवी किस काम के हैं। शहरों की तीसरी आंख का हिसाब कौन देगा इसका जवाब अभी भी पुलिस महकमे के पास शायद नहीं है?
उत्तराखण्ड के हर जनपद के शहरों और कस्बों में सुरक्षा के नाम पर जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे दिखाई देते हैं। चौराहे हों, मुख्य बाजार हों या महत्वपूर्ण मार्ग कैमरों की मौजूदगी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने का भरोसा देती है। लेकिन जब कोई बड़ी वारदात होती है और पुलिस को घटनास्थल से लेकर आसपास की दुकानों, मकानों और प्रतिष्ठानों के निजी कैमरों की फुटेज खंगालनी पड़ती है, तब एक सीधा सवाल उठता है सरकारी निगरानी के लिए लगाए गए कैमरे आखिर उस वक्त कहां हैं? अपराध के बाद सीसीटीवी फुटेज जुटाना पुलिस जांच का सामान्य और जरूरी हिस्सा है। निजी कैमरे भी कई मामलों में बेहद महत्वपूर्ण सुराग देते हैं। सवाल निजी फुटेज देखने का नहीं, बल्कि यह जानने का है कि सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए सरकारी कैमरों में कितने वास्तव में चालू हैं और कितनों की लाइव निगरानी हो रही है। कई बार वारदात के बाद पता चलता है कि किसी स्थान का कैमरा बंद था, उसकी दिशा उपयोगी नहीं थी, तस्वीर साफ नहीं आई या रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं हो सकी। यदि ऐसा है तो कैमरा केवल खंभे पर लटका उपकरण बनकर रह जाता है। सुरक्षा व्यवस्था का मतलब कैमरा खरीदकर लगा देना नहीं, बल्कि उसे लगातार चालू रखना और जरूरत पड़ने पर उपयोगी फुटेज उपलब्ध होना है।
प्रशासन और पुलिस को समय-समय पर सीसीटीवी नेटवर्क का तकनीकी ऑडिट कराना चाहिए। कितने सरकारी कैमरे लगाए गए, कितने चालू हैं, कितने खराब हैं, कितनों में रात के समय साफ तस्वीर आती है और रिकॉर्डिंग कितने दिनों तक सुरक्षित रहती है इसकी नियमित समीक्षा जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण है ब्लाइंड स्पॉट की पहचान। अपराधी यदि मुख्य चौराहे के कैमरे में दिखाई भी दे जाए लेकिन अगली सड़क पर निगरानी ही न हो तो उसकी गतिविधि की पूरी कड़ी टूट सकती है। इसलिए कैमरे संख्या देखकर नहीं, अपराध और यातायात की दृष्टि से संवेदनशील स्थानों की मैपिंग करके लगाए जाने चाहिए। एक और सवाल नियंत्रण कक्ष का है। यदि कैमरे लाइव निगरानी व्यवस्था से जुड़े हैं तो संदिग्ध गतिविधि, दुर्घटना या अपराध की सूचना कितनी जल्दी संबंधित थाना-चौकी तक पहुंचती है? सीसीटीवी का असली फायदा केवल अपराध के बाद फुटेज निकालने में नहीं, बल्कि कई परिस्थितियों में समय रहते पुलिस प्रतिक्रिया बेहतर करने में भी है। बाजारों में व्यापारियों और घरों में आम लोगों ने अपने खर्च पर कैमरे लगाए हैं। पुलिस जांच में यही निजी कैमरे अक्सर मददगार साबित होते हैं। उनका सहयोग महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा की बुनियादी निगरानी व्यवस्था का पूरा भार निजी कैमरों पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए एक सीसीटीवी हेल्थ ऑडिट व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। प्रत्येक संवेदनशील क्षेत्र के कैमरे की नियमित जांच हो। खराब कैमरा कितने समय में ठीक होगा, इसकी समयसीमा तय हो और रखरखाव के लिए जिम्मेदार एजेंसी की जवाबदेही भी निर्धारित की जाए।
सवाल कैमरों की संख्या का नहीं, उनकी निगरानी और उपयोगिता का है। शहर में सैकड़ों कैमरे दिखाई देने से सुरक्षा मजबूत नहीं होतीय असली परीक्षा तब होती है जब वारदात के बाद पुलिस को फुटेज चाहिए। कैमरा उसी वक्त बंद मिले तो खंभे पर लगा वह उपकरण सुरक्षा नहीं, व्यवस्था की कमजोरी का आईना बन जाता है। अब जरूरत इस बात की है कि पुलिस और प्रशासन कैमरों की गिनती के बजाय उनका वास्तविक ऑडिट सामने रखेंकृकितने लगे हैं, कितने चल रहे हैं और कितने सिर्फ लगे हुए दिखाई दे रहे हैं?