मां की सौगंध के बाद सड़क पर हरदा

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हरीश ने शक्ति प्रदर्शन से दिया सियासी संदेश
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक बार फिर अपने अंदाज में सियासी पत्ते खोल दिए हैं। कुछ दिन पहले तक पूर्व ओएसडी पर ईडी की कार्रवाई के बाद उठे सवालों और अपने दो संगठनात्मक पदों से हटने की इच्छा को लेकर चर्चा में रहे हरदा अब समर्थकों और गाड़ियों के काफिले के साथ सड़क पर उतरे तो उत्तराखंड की राजनीति का पारा चढ़ गया। दिल्ली से लौटते समय रामपुर तिराहा स्थित उत्तराखंड शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद देहरादून की ओर बढ़े उनके काफिले को 2027 से पहले बड़े शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।
हरीश रावत उत्तराखंड की राजनीति के उन पुराने खिलाड़ियों में हैं जो लंबे समय तक खामोश दिखाई देने के बाद अचानक ऐसा राजनीतिक आयोजन खड़ा कर देते हैं कि चर्चा का केंद्र बदल जाता है। कभी अपने आवास पर पार्टी, कभी किसी स्थानीय उत्पाद को लेकर आयोजन, कभी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा और कभी सोशल मीडिया से सीधा हमला हरदा ने अपनी राजनीति का तरीका हमेशा अलग रखा है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भी हरीश रावत सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। सरकार के फैसलों से लेकर कांग्रेस की रणनीति और प्रदेश के मुद्दों तक वह अपनी बात रख रहे हैं। ऐसे में उनकी सक्रियता को लेकर पहले से राजनीतिक चर्चाएं थीं, लेकिन पूर्व ओएसडी से जुड़े मामले में ईडी की कार्रवाई ने अचानक पूरे घटनाक्रम को दूसरा मोड़ दे दिया। वर्ष 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच के सिलसिले में ईडी ने उनके पूर्व व्ैक् एवं लंबे समय से सहयोगी रहे चंदन सिंह जीना से जुड़े ठिकानों पर कार्रवाई की। जांच एजेंसी ने नकदी, सोना और महंगी घड़ियां बरामद करने की जानकारी दी है। जांच अभी जारी है और इस कार्रवाई से हरीश रावत की व्यक्तिगत संलिप्तता का कोई अंतिम निष्कर्ष स्थापित नहीं होता। लेकिन राजनीति में किसी करीबी पर शिकंजा कसता है तो सवाल बड़े चेहरे तक पहुंचने में देर नहीं लगती।
ईडी की कार्रवाई के बाद विरोधियों ने हरदा को निशाने पर लेना शुरू किया तो हरीश रावत ने कांग्रेस के अपने दो संगठनात्मक पदों से हटने की इच्छा जाहिर कर दी। एक तरफ पद छोड़ने की पेशकश थी तो दूसरी तरफ उन्होंने यह कहकर कांग्रेस छोड़ने की चर्चाओं को विराम दिया कि कांग्रेस उनके दिल और जीवन में बसती है। इसके बाद हरदा ने ऐसा भावनात्मक दांव चला जिसने उत्तराखंड की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। सोशल मीडिया पर अपनी स्वर्गीय मां की तस्वीर हाथ में लेकर और देवी मां की तस्वीर सामने रखकर हरीश रावत ने सौगंध खाई कि नौकरी देने के बदले उन्होंने किसी से एक कप चाय तक नहीं पी। सवाल यहीं से और बड़ा हो गयाकृआखिर किस आरोप की चोट इतनी गहरी थी कि उत्तराखंड की राजनीति के इतने पुराने खिलाड़ी को अपनी मां की सौगंध लेकर जनता के सामने अपनी बात रखनी पड़ी? कल तक हरदा अपने ऊपर उठ रहे सवालों का जवाब सोशल मीडिया पर दे रहे थे, आज वही हरदा समर्थकों और गाड़ियों के काफिले के साथ सड़क पर हैं। रामपुर तिराहा स्थित उत्तराखंड शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि के बाद देहरादून तक उनकी यात्रा में दिखाई दिया समर्थकों का जमावड़ा राजनीतिक हलकों में सामान्य वापसी से कहीं ज्यादा बड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
सवाल अब यह नहीं कि हरदा के काफिले में कितनी गाड़ियां थीं। असली सवाल है कि यह ताकत दिखाई किसे गई? क्या यह उन विरोधियों के लिए जवाब था जो पूर्व व्ैक् पर ईडी की कार्रवाई के बाद हरदा के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े कर रहे थे? या फिर कांग्रेस के भीतर उन नेताओं के लिए संदेश था जो 2027 से पहले पार्टी में अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं? हरीश रावत के समर्थक इसे उनकी राजनीतिक ताकत के प्रदर्शन के रूप में देख सकते हैं, जबकि विरोधी इसके अलग मायने निकाल रहे हैं। लेकिन इतना तय है कि इस घटनाक्रम ने 2027 से पहले कांग्रेस के भीतर हरीश रावत की भूमिका को लेकर चर्चा को फिर तेज कर दिया है। हरदा की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि उन्हें आसानी से राजनीतिक मैदान से बाहर मान लेना जल्दबाजी रही है। सत्ता मिली, मुख्यमंत्री की कुर्सी गई, चुनावी पराजय मिली और पार्टी के भीतर भी कई बार चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां बनीं, लेकिन वह किसी न किसी मुद्दे या राजनीतिक कार्यक्रम के जरिए फिर चर्चा के केंद्र में लौटते रहे हैं। क्या कांग्रेस हाईकमान एक बार फिर हरीश रावत को चुनावी रण में बड़ी जिम्मेदारी देकर आगे करेगा, या पार्टी उन्हें वरिष्ठ नेता और मार्गदर्शक की भूमिका में रखकर नई पीढ़ी पर दांव लगाएगी? इसका फैसला कांग्रेस नेतृत्व को करना है। फिलहाल तस्वीर साफ है पूर्व ओएसडी पर ईडी की कार्रवाई ने हरदा के सामने राजनीतिक सवाल खड़े किए, उन्होंने पद छोड़ने की इच्छा जताई, मां की सौगंध लेकर आरोपों का जवाब दिया और अब सड़क पर समर्थकों के बीच उतरकर अपनी राजनीतिक सक्रियता का प्रदर्शन किया है। ईडी की जांच अपनी जगह है और उसका अंतिम सच जांच से ही सामने आएगा, लेकिन 2027 से पहले हरदा ने सड़क पर उतरकर इतना जरूर दिखा दिया है कि उत्तराखंड कांग्रेस की सियासी बिसात पर उनकी मौजूदगी को अभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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