फर्जी प्रमाण पत्रों से सरकारी नौकरी करने का चक्रव्यूह भेदेंगे सीएम

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फर्जी एसटी प्रमाण पत्रों पर खुलेंगी पुरानी फाइलें?
आरक्षण में फर्जीवाड़ा हुआ तो नपेंगे जिम्मेदार
अधिवक्ता को धाकड़ सीएम से उम्मीद
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड में आरक्षित श्रेणी के कथित फर्जी और संदिग्ध प्रमाणपत्रों का मामला अब सरकारी महकमों में वर्षों से नौकरी कर रहे अधिकारियों और कर्मचारियों तक पहुंच सकता है। अधिवक्ता ने इस मुद्दे पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए 28 नवंबर 2000 के बाद अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्त और वर्तमान में कार्यरत अधिकारियों के जाति प्रमाणपत्रों की वैधानिकता की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है। हालांकि अधिवक्ता ने पहले ही मुख्य सचिव को भी अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए पत्र लिखकर मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की थी लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ। अब अधिवक्ता को उम्मीद है कि मुख्यमंत्री अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्रों की ए से लेकर जेड तक जांच करायेंगे और यह सच भी सामने ला सकते हैं कि आखिरकार इन प्रमाण पत्रों के दम पर कितने छोटे-बडे कर्मचारी और अधिकारी सरकारी नौकरी में आसीन हैं।
नेगी ने पुलिस कप्तान को पत्र भेजकर मांग की है कि फर्जी प्रमाणपत्रों के संबंध में गठित कमेटी की जांच में उनके शिकायती पत्र को भी शामिल किया जाए। उनका साफ कहना है कि मामला किसी अधिकारी की निजी जातिगत पहचान जानने का नहीं, बल्कि संवैधानिक आरक्षण की उस व्यवस्था की रक्षा का है, जिसका लाभ केवल विधिक रूप से पात्र व्यक्ति को मिलना चाहिए। पत्र में गंभीर सवाल उठाया गया है कि यदि किसी व्यक्ति ने जाली, संदिग्ध, त्रुटिपूर्ण अथवा अधिकार क्षेत्र से बाहर जारी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी या पदोन्नति हासिल की है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान वास्तविक अनुसूचित जनजाति अभ्यर्थी को हुआ होगा। आरक्षित पद पर अपात्र व्यक्ति की नियुक्ति होने की स्थिति में पात्र अभ्यर्थी रोजगार और पदोन्नति के अपने अधिकार से वंचित हो सकता है। मामला सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं है। ऐसे प्रमाणपत्र के आधार पर यदि किसी ने वर्षों तक वेतन, पदोन्नति और दूसरे सरकारी लाभ लिए हैं तो सरकारी धन और पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की वैधानिकता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
अब निगाह सरकार और जांच एजेंसियों पर है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आरक्षित श्रेणी के प्रमाणपत्रों की जांच और फर्जीवाड़ा सामने आने पर सख्त कार्रवाई की बात कह चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच केवल हाल में सामने आए मामलों तक सीमित रहेगी, या फिर सरकारी विभागों में वर्षों से आरक्षित पदों पर नौकरी कर रहे अधिकारियों-कर्मचारियों के प्रमाणपत्रों की फाइलें भी खुलेंगी? अधिवक्ता विकेश नेगी के पत्र ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। यदि उच्चस्तरीय जांच शुरू होती है तो तस्वीर साफ हो सकती है कि उत्तराखंड में 28 नवंबर 2000 के बाद एसटी प्रमाणपत्रों के आधार पर हुई नियुक्तियों में सभी प्रमाणपत्र वैधानिक कसौटी पर खरे उतरते हैं या कहीं आरक्षण के वास्तविक हकदारों के अधिकारों में सेंध लगी है। फिलहाल किसी विशिष्ट अधिकारी का प्रमाणपत्र फर्जी साबित होने की पुष्टि नहीं है। इसलिए असली तस्वीर दस्तावेजों की वैधानिक जांच के बाद ही सामने आएगी।

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