पार्किंग नहीं तो कारोबार की इजाजत कैसे?

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प्रतिष्ठानों की पार्किंग गायब, सड़कों पर वाहनों का कब्जा
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। राजधानी में बिना पार्किंग के खुलते प्रतिष्ठान पर सरकार और सिस्टम की नजर कब जायेगी यह तो एक बडा सवाल है लेकिन पार्किंग न होने के कारण आम जनता को जाम के झाम में जिस तरह से फसना पड़ रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। आम जनमानस का मानना है कि होटल, बैंक से अस्पताल और बडे-बडे शोरूम तक पार्किंग की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे कि वहां आने वाले वाहनों के कारण किसी भी व्यक्ति को परेशानी का सामना न करना पडे़। हैरानी वाली बात तो यह है कि शहर के अन्दर सड़क को पार्किंग बनाने की आखिर छूट कैसे और किसने दे रखी है यह सिस्टम की मंशा पर सवालिया निशान लगा रहा है। शहर के काफी कॉम्पलैक्स ऐसे हैं जहां पार्किग की गायब है और वहां आने वाहन सड़कों पर अपना कब्जा जमाकर बैठते हैं। सवाल तैर रहा है कि नक्शे में पार्किंग लेकिन जमीन पर कारोबार तो यह देखने के लिए सिस्टम कब अपनी आंखे खोलेगा यह शहर के अन्दर एक बडा सवाल खडा हो रखा है।
उत्तराखण्ड के कुछ शहरों और कस्बों में जाम की समस्या पर हर बार यातायात पुलिस और सड़क पर खड़े वाहनों को जिम्मेदार ठहरा देना आसान है, लेकिन असली सवाल उन होटलों, बैंकों, अस्पतालों, रेस्टोरेंट, शोरूम और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का भी है, जहां रोज सैकड़ों लोग पहुंचते हैं लेकिन पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था दिखाई नहीं देती। प्रतिष्ठान खुलते हैं, कारोबार बढ़ता है और ग्राहकों के वाहन सड़क पर खड़े होने लगते हैं। नतीजा सड़क संकरी, यातायात बाधित और जाम का खामियाजा आम जनता भुगतती है। सवाल है कि ऐसे प्रतिष्ठानों को संचालन की अनुमति देते समय पार्किंग व्यवस्था की जांच किस स्तर पर की गई? यदि किसी भवन के नक्शे में पार्किंग दिखाई गई थी तो मौके पर वह पार्किंग आज मौजूद है या उसका इस्तेमाल किसी दूसरे व्यावसायिक काम के लिए हो रहा है? बेसमेंट पार्किंग के लिए स्वीकृत था तो वहां वाहन खड़े हो रहे हैं या दुकान, गोदाम और अन्य गतिविधियां चल रही हैं? प्रशासन और संबंधित निकाय को इसका भौतिक सत्यापन करना चाहिए।
राजधानी के अन्दर विशेष चिंता अस्पतालों की है। जहां मरीज, तीमारदार और एंबुलेंस लगातार पहुंचते हैं, वहां सड़क पर बेतरतीब पार्किंग केवल जाम नहीं बल्कि आपात स्थिति में जान बचाने वाले रास्ते की बाधा भी बन सकती है। बैंकों और बड़े शोरूम के बाहर भी यही स्थिति हो तो केवल वाहन चालक का चालान समाधान नहीं है। सवाल प्रतिष्ठान की जवाबदेही का भी होना चाहिए। जिस व्यवसाय के कारण प्रतिदिन बड़ी संख्या में वाहन पहुंच रहे हैं, उसके पास निर्धारित पार्किंग क्षमता है या नहीं, इसकी नियमित जांच क्यों नहीं? प्रशासन को बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का पार्किंग ऑडिट कराना चाहिए। स्वीकृत नक्शा, वास्तविक पार्किंग क्षेत्र और मौके की स्थिति का मिलान हो। नियमों का उल्लंघन मिले तो कानून के मुताबिक कार्रवाई हो और नियम सभी पर समान रूप से लागू हों। सड़क जनता के आवागमन के लिए है, किसी निजी प्रतिष्ठान की मुफ्त पार्किंग नहीं। जाम हटाना है तो केवल सड़क पर खड़े वाहन को देखकर चालान काटने से आगे बढ़ना होगा। सवाल सीधा है जब प्रतिष्ठान के पास अपने ग्राहकों के वाहन खड़े करने की जगह ही नहीं, तो उसे इतने बड़े स्तर पर कारोबार करने की अनुमति आखिर किन शर्तों पर मिली?

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