तबादले होते रहे, कुछ कुर्सियां क्यों नहीं हिली?

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में एक लम्बे अर्से से यह बहस चलती आ रही है कि कुछ अधिकारी व कर्मचारी ऐसे हैं जो वर्षों से एक ही कुर्सी पर जमे हुये हैं जिन पर किसकी मेहरबानी है यह हमेशा एक बडा सवाल खडा होता आ रहा है? बहस चलती रही है कि संवेदनशील सीटों पर वर्षों की तैनाती अनुभव है या मजबूत होता नेटवर्क? सवाल है कि तबादले होते रहे लेकिन कुछ कुर्सियां क्यों नहीं हिली यह आम जनमानस के मन में भी एक बडा सवाल तैरता आ रहा है।
उत्तराखण्ड में लम्बे समय से एक बहस चलती आ रही है कि सरकारी व्यवस्था में अनुभव जरूरी है, लेकिन जब कोई अधिकारी, कर्मचारी वर्षों तक एक ही संवेदनशील सीट पर जमा रहे तो अनुभव के साथ सवाल भी पैदा होते हैं। आखिर एक ही कुर्सी पर इतनी लंबी तैनाती की आवश्यकता क्या है? क्या विभाग के पास दूसरा योग्य अधिकारी, कर्मचारी नहीं या फिर स्थानांतरण की व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित है? राजस्व, परिवहन, नगर निकाय और दूसरे जनसंपर्क व प्रवर्तन से जुड़े विभागों में कई पद ऐसे होते हैं जहां रोजाना जनता, ठेकेदारों, कारोबारियों और विभिन्न हितधारकों से सीधा संपर्क रहता है। ऐसी सीटों पर लंबे समय तक एक ही व्यक्ति की तैनाती से निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसका अर्थ यह नहीं कि वर्षों से तैनात हर अधिकारी, कर्मचारी गलत है, लेकिन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी व्यक्ति पर सवाल उठने की गुंजाइश ही कम रहे। सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा होता है जब अधिकारी, कर्मचारी का कार्यालय बदल जाए, लेकिन कुछ समय बाद वह फिर उसी तरह की प्रभावशाली सीट पर लौट आए। यदि स्थानांतरण नीति है तो संवेदनशील पदों के लिए स्पष्ट अधिकतम कार्यकाल भी होना चाहिए और उसका पालन सब पर समान रूप से होना चाहिए।
सरकार और शासन को संवेदनशील विभागों का सीटवार ऑडिट कराना चाहिए। कौन अधिकारी, कर्मचारी किस सीट पर कितने समय से तैनात है, पिछले पांच वर्षों में उसकी तैनाती कहां-कहां रही और क्या बार-बार वही जिम्मेदारी मिली इसकी समीक्षा मुश्किल नहीं है। लंबी तैनाती अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है, लेकिन पारदर्शी रोटेशन भ्रष्टाचार और हितों के टकराव की आशंका कम करने का मजबूत तरीका जरूर है। ईमानदार अधिकारी, कर्मचारी के लिए भी यह व्यवस्था सुरक्षा का काम करेगी, क्योंकि उसके काम पर अनावश्यक संदेह नहीं उठेगा। सवाल किसी अधिकारी, कर्मचारी को कटघरे में खड़ा करने का नहीं, उस व्यवस्था को मजबूत करने का है जिसमें कुर्सी किसी की स्थायी पहचान न बन जाए। सरकारी सीट जिम्मेदारी है, जागीर नहीं। समयबद्ध रोटेशन होगा तो सिस्टम व्यक्ति के भरोसे नहीं, नियम के भरोसे चलेगा।

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