युवाओं का संबल बनेंगे धाकड़

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प्रमुख संवददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने अब पहाड़ से लेकर मैदान तक युवाओं से सीधा संवाद करके उनकी नब्ज खंगालने का मिशन शुरू किया है और वह युवाओं के सपनों को पंख लगाने के लिए उन्हें सरकार का साथ देने का वचन दे रहे हैं। पेपर लीक के गंभीर परिणाम सामने आने से युवा पीढ़ी में जो आक्रोश की ज्वाला देखने को मिल रही है उसको लेकर कांग्रेस भी सरकार के खिलाफ मुखर हो रखी है और उसने युवा पीढ़ी को सीधा संदेश दिया हुआ है कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होने दिया जायेगा और यही कारण है कि कांग्रेस राज्य में पेपर लीक को लेकर आक्रामक रूख अपनाये हुये है। कांग्रेस के इस आक्रामक रूख को भांपते हुए मुख्यमंत्री ने युवाओं को परीक्षाओं के लिए मुफ्त कोचिंग दिलाने का जो मास्टर स्ट्रोक खेला है उससे युवा पीढ़ी पेपर लीक की पीड़ा को भूल पायेगी यह एक बहस का विषय है। हालांकि मुख्यमंत्री ने युवा भविष्य पर फोकस करके उन्हें साधने का जो मिशन शुरू किया है उस पर विपक्षी दलों की नजरें लग गई हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की यह पहल अगर इसी सोच के साथ जमीन पर उतरी तो यह केवल मुफ्त कोचिंग योजना नहीं रहेगी। यह उस युवा के लिए बराबरी का दरवाजा बन सकती है, जिसके सपने बड़े हैं लेकिन संसाधन सीमित और यही किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है युवा को सिर्फ उम्मीद देना नहीं, उसे आगे बढ़ने का अवसर देना। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में इस फैसले का महत्व केवल ‘मुफ्त कोचिंग’ तक सीमित नहीं है। असली मुद्दा अवसर की बराबरी का है। देहरादून जैसे शहरों में रहकर महंगी कोचिंग लेने वाले अभ्यर्थियों और दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में संसाधनों के अभाव में तैयारी करने वाले युवाओं के बीच जो अंतर दिखाई देता है, उसे डिजिटल माध्यम से कम करने की कोशिश इस योजना में दिखाई देती है। मुख्यमंत्री धामी ने योजना को मंजूरी देकर एक ऐसा रास्ता खोलने की कोशिश की है, जिसमें प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी किसी परिवार की आर्थिक क्षमता पर निर्भर न रहे। योजना के तहत सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे विद्यार्थियों को ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और मार्गदर्शन उपलब्ध कराने की बात सामने आई है।
सरकार की यह पहल निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, लेकिन किसी भी योजना की असली सफलता उसकी घोषणा से नहीं, उसके परिणाम से तय होती है। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिजिटल संसाधन और विद्यार्थियों तक जानकारी पहुंचाना अपने आप में चुनौती है। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि योजना केवल कागजों और पोर्टल तक सीमित न रह जाए। जिस युवा के पास महंगी कोचिंग की सुविधा नहीं है, उसके मोबाइल या कॉलेज तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वास्तव में पहुंचेकृयही इस योजना की सबसे बड़ी कसौटी होगी। अगर सरकार इस योजना को प्रभावी ढंग से जमीन पर उतार पाती है तो इसका फायदा सिर्फ परीक्षा देने वाले युवाओं को नहीं मिलेगा। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में आर्थिक असमानता भी कम हो सकती है।
उत्तराखंड में युवा लंबे समय से रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर अपनी उम्मीदें सरकार से जोड़ते रहे हैं। ऐसे में मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की पहल को केवल एक योजना के रूप में नहीं, बल्कि युवाओं में निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार को अब आगे बढ़कर यह भी बताना चाहिए कि कितने युवाओं को योजना का लाभ मिलेगा, कितने विषयों और परीक्षाओं की तैयारी कराई जाएगी, शिक्षकों और कोचिंग संस्थानों का चयन किस आधार पर होगा और पहाड़ी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए डिजिटल सुविधा कैसे सुनिश्चित की जाएगी। योजना की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण तब होगा जब उत्तराखंड के छोटे गांव-कस्बों से निकलने वाला युवा भी वही तैयारी कर सके, जो बड़े शहरों के महंगे कोचिंग संस्थानों में बैठने वाला विद्यार्थी करता है।

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