शहर से पन्द्रह किलोमीटर दूर मेहरकोट

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सड़क का गुलाम!
उठी आवाजः सीएम साहब हमारे गांव की बनवा दो सड़क
विकास की सड़क बनाने में सिस्टम क्यों बेबस?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून/सहसपुर। देश ने 80वां स्वतंत्रता दिवस मना लिया, विकास और सुविधाओं के दावे भी खूब हुए, लेकिन राजधानी देहरादून से महज करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मेहरकोट गांव आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहा है। गांव तक पहुंचने वाली करीब 200 मीटर की खतरनाक चढ़ाई वाली सड़क वर्षों से अधूरी पड़ी है। बरसात आते ही जो थोड़ा-बहुत रास्ता बचा है, वह भी कीचड़, मलबे और भू-कटाव से जूझने लगता है।
मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि सहसपुर क्षेत्र में हाल ही में एक सड़क निर्माण को लेकर हुए विवाद के दौरान विधायक सहदेव सिंह पुंडीर की ओर से सड़क नहीं बनने पर इस्तीफा देने तक की बात कही गई थी। अब मेहरकोट के ग्रामीण उसी बयान को सवाल की तरह सामने रख रहे हैं क्या मेहरकोट की सड़क के लिए भी कोई ऐसी ही प्रतिबद्धता और संकल्प दिखाएगा? ग्रामीणों का कहना है कि उनकी मांग कोई बड़ी परियोजना नहीं, बल्कि वर्षों से अधूरे पड़े महज करीब 200 मीटर हिस्से को पूरा कराने की है। बताया जाता है कि इस हिस्से में वन विभाग से जुड़ी अनुमति और नियमों का पेंच फंसा हुआ है। लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि जब केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर लंबे समय से भाजपा की सरकार है और सरकार विकास को प्राथमिकता देने का दावा करती है, तो इतने छोटे से हिस्से की बाधा वर्षों में क्यों नहीं दूर हो सकी? कुछ वर्ष पहले विधायक निधि से सड़क के एक हिस्से का निर्माण कराया गया था, लेकिन पूरी सड़क आज तक मुकम्मल नहीं हो पाई। जो हिस्सा बना था, वह भी समय के साथ जर्जर हो चुका है। बरसात में हालात और बदतर हो जाते हैं। पहाड़ी से मलबा आने, भू-कटाव होने और पेड़ गिरने के कारण रास्ता कई बार बाधित हो जाता है। ग्रामीणों को खुद श्रमदान कर रास्ते को किसी तरह चलने लायक बनाना पड़ता है। दो दिन पहले भी लगातार बारिश से क्षतिग्रस्त रास्ते को ग्रामीणों ने खुद मिलकर बमुश्किल आवागमन योग्य बनाया।

एंबुलेंस तो दूर, स्कूल बस भी नहीं पहुंचती
सड़क की बदहाली का सबसे बड़ा असर बच्चों और मरीजों पर पड़ रहा है। ग्रामीणों के अनुसार स्कूल बस और वैन गांव तक नहीं पहुंच पातीं। बच्चों को रोज पैदल दुर्गम रास्ते से स्कूल जाना पड़ता है। ग्रामीण यह भी बताते हैं कि रास्ते में कई बार गुलदार दिखाई देने से बच्चों की सुरक्षा को लेकर डर बना रहता है। गांव का एकमात्र सरकारी स्कूल भी दुर्गम परिस्थितियों और कम होती आबादी के चलते वर्षों पहले बंद हो चुका है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई के लिए उन्हें गांव से बाहर जाना पड़ता है। बरसात के दिनों में यह सफर और जोखिम भरा हो जाता है। बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना भी ग्रामीणों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं। एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती तो मरीज को सड़क तक लाने के लिए लोगों को सहारा लेना पड़ता है। रोजमर्रा की जरूरत का सामान हो या आपातकालीन स्थितिकृहर काम में खराब सड़क ग्रामीणों के सामने दीवार बनकर खड़ी है।

सड़क नहीं तो गांव भी नहीं बच रहा
मेहरकोट की बदहाल सड़क अब केवल आवागमन की समस्या नहीं रह गई है। इसका सीधा असर गांव के अस्तित्व पर पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक लगातार पलायन के कारण अब गांव में मुश्किल से 10-12 परिवार ही रह गए हैं। बेहतर सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाओं की तलाश में बड़ी संख्या में लोग पोंधा और अन्य स्थानों पर जाकर बस चुके हैं। कभी आबाद रहने वाले गांव में खेती भी प्रभावित हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि बेहतर जीवन की मजबूरी में कई किसान अपनी जमीन तक बेच रहे हैं। सवाल यह है कि जब सड़क और बुनियादी सुविधाएं ही गांव तक नहीं पहुंचेंगी तो सरकार की पलायन रोकने की नीति जमीन पर कैसे सफल होगी?
ग्रामीणों की पीड़ा को समझने के लिए शायद किसी बड़ी बैठक की जरूरत नहीं है। वे सिस्टम के जिम्मेदार अधिकारियों के सामने सीधी चुनौती रख रहे हैं एक बार कोई प्राधिकृत अधिकारी अपनी सरकारी कार लेकर इस रास्ते से मेहरकोट तक पहुंचकर दिखाए। अगर अधिकारी स्वयं इस रास्ते की हालत देखकर गांव तक पहुंचने में होने वाली परेशानी महसूस कर लें तो शायद फाइलों में दर्ज ‘सड़क समस्या’ की असली तस्वीर भी सामने आ जाएगी। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार विधायक गांव आए, बैठकें हुईं, आश्वासन मिले, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं निकल पाया। अब उन्हें आश्वासन नहीं चाहिए। वे चाहते हैं कि जिस सड़क के लिए वर्षों से मांग उठ रही है, वह वास्तव में जमीन पर दिखाई दे।
मेहरकोट की कहानी सिर्फ एक सड़क की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहां राजधानी से कुछ ही किलोमीटर दूर रहने वाला गांव वर्षों तक बुनियादी सुविधा का इंतजार करता रहे। यह उस विकास मॉडल पर भी सवाल है जिसमें सड़क के अभाव में गांव खाली होते जाएं और फिर सरकार पलायन रोकने की योजनाएं बनाए। पक्की सड़क के इंतजार में मेहरकोट की पीढ़ियां गुजर गईं। आज भी ग्रामीणों को हर बरसात के बाद रास्ता खुद ठीक करना पड़ता है। सवाल यह है कि आखिर इस छोटी-सी सड़क के लिए कितनी और पीढ़ियों को इंतजार करना होगा? अब ग्रामीणों की नजर विधायक सहदेव सिंह पुंडीर, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, संबंधित विभाग और जिला प्रशासन पर है। क्या मेहरकोट की 200 मीटर सड़क का वन विभाग की फाइलों में फंसा पेंच निकलेगा? क्या जर्जर रास्ते की मरम्मत होगी? क्या अधूरी सड़क पूरी होगी? और क्या जिम्मेदार अधिकारी खुद इस रास्ते पर चलकर इसकी वास्तविक स्थिति देखेंगे? क्योंकि मेहरकोट के ग्रामीणों का सवाल बेहद सीधा है। “चुनाव में वोट मांगने के लिए नेता इस रास्ते से पहुंच सकते हैं, तो विकास की सड़क बनाने के लिए सिस्टम इस रास्ते पर क्यों नहीं पहुंच सकता?” अब मेहरकोट को आश्वासन नहीं, सड़क चाहिए।

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