क्या सिस्टम में भी पॉवरफुल हैं राज्यमंत्री?

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राज्यमंत्री का ताज और अपनों को जिताने का टास्क
पार्टी उम्मीदवारों को जीत का ताज पहना पायेंगे छोटे मंत्री?
देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने पार्टी के दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं को सम्मान देने के लिए उन्हें राज्यमंत्री का ताज पहनाकर उन्हें पार्टी को मजबूत करने की दिशा में एक मास्टर स्ट्रोक खेला है लेकिन सवाल यह है कि चुनाव से मात्र कुछ माह पूर्व बनाये गये दर्जनों राज्यमंत्री क्या अपने इलाकों में उन राजनेताओं को विधायक का ताज पहना पायेंगे जो आने वाले विधानसभा चुनाव में जीत का सपना पाल रहे हैं? मुख्यमंत्री ने तो राज्यमंत्री बनाकर उन्हें पार्टी के अन्दर एक बडा सम्मान दिया है लेकिन क्या भाजपा के बडे-बडे नेता और राज्य की अधिकांश अफसरशाही इन राज्यमंत्रियों का इकबाल बुलंद रखने के लिए उनके साथ खडी है के नहीं यह एक बहस राज्य के अन्दर अब उठ खड़ी हुई है? चुनाव से पहले इन राज्यमंत्रियों को अपने इलाकों में चुनावी रण में कूदने का हुक्म मिल चुका है लेकिन सवाल यही है कि क्या बिना किसी अधिकार के यह राज्यमंत्री अपने इलाकों की जनता के वो काम कराने का दम रख पायेंगे जिसकी चाहत जनता के मन में उठ रही होगी? कार पर राज्यमंत्री का बोर्ड होने से वह अपनी विधानसभा में आवाम का दिल जीत पायेंगे यह एक नई बहस अब चुनाव से पहले शुरू होने लगी है?
राजनीति में पद का वजन उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव से तय होता है। जिस नेता के एक फोन पर व्यवस्था हरकत में आ जाए, जनता उसी को अपना मजबूत प्रतिनिधि मानती है। लेकिन उत्तराखंड में इन दिनों सत्ता के गलियारों से लेकर गांव-गांव की चौपालों तक एक सवाल तैर रहा है क्या राज्य मंत्री का दर्जा अब सिर्फ सम्मान का प्रतीक बनकर रह गया है? मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चुनावी माहौल में कई नेताओं पर भरोसा जताते हुए उन्हें राज्य मंत्री स्तर की जिम्मेदारियां सौंपीं है। उन नेताओं के समर्थकों ने इसे अपने क्षेत्र के सम्मान के रूप में देखा। फूल बरसे, मिठाइयां बंटी और उम्मीद जगी कि अब इलाके की आवाज सीधे शासन तक पहुंचेगी। लोगों को लगा कि उनका नेता अब और मजबूत होकर उनके बीच लौटेगा लेकिन समय के साथ यह उत्साह कई जगह सवालों में बदलता नजर आ रहा है। राजनीति में सबसे कठिन स्थिति तब होती है, जब किसी नेता के पास पद तो हो, लेकिन जनता के काम कराने की ताकत न हो। जनता यह नहीं देखती कि आदेश किस फाइल में अटका है। जनता सिर्फ इतना जानती है कि उसने जिस नेता पर भरोसा किया, क्या वह उसके लिए खड़ा हो पाया या नहीं?
आज कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा सुनाई देती है कि जिन नेताओं को सरकार ने आगे बढ़ाया, क्या उन्हें उतनी ही ताकत भी दी गई, जितनी जिम्मेदारी उनके कंधों पर रखी गई? अगर नहीं, तो चुनावी रण में वही नेता अपने क्षेत्र की जनता की उम्मीदों का बोझ कैसे उठाएगा? सत्ता की असली ताकत कुर्सी नहीं, विश्वास होता है। और विश्वास तभी बनता है, जब जनता महसूस करे कि उसका प्रतिनिधि उसकी आवाज को शासन के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। यदि किसी राज्य मंत्री को हर छोटे-बड़े काम के लिए दर-दर दस्तक देनी पड़े, तो सबसे ज्यादा चोट उसके आत्मसम्मान पर लगती है। इससे उसके समर्थकों का मनोबल भी प्रभावित होता है। चुनाव सिर पर हैं। भाजपा मिशन-2027 को लेकर पूरी ताकत से मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। ऐसे समय में सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन चेहरों को जनता के बीच अपना दूत बनाकर भेजा गया है, क्या उन्हें पर्याप्त अधिकार और प्रभाव भी दिया गया है? क्योंकि चुनाव केवल नारों से नहीं जीते जाते, बल्कि उन चेहरों के भरोसे जीते जाते हैं जो जनता के सुख-दुख में सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली तेज फैसलों के लिए जानी जाती है। ऐसे में राजनीतिक हल्कों की नजर अब इस बात पर है कि क्या सरकार इन राज्य मंत्रियों की भूमिका को और प्रभावी बनाएगी, ताकि वे अपने क्षेत्रों में केवल नाम के नहीं, बल्कि काम के राज्य मंत्री बनकर उभरें। क्योंकि राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है सम्मान मिलना बड़ी बात है, लेकिन सम्मान को बचाए रखने के लिए अधिकार भी उतने ही जरूरी होते हैं। जनता अंततः पद नहीं, परिणाम याद रखती है।

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