बारिश में ’तमाशा’ बनती स्मार्ट सिटी

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विकास की चमक के पीछे जलभराव का सच
डूबता शहर! हवा में शहर का विकास मॉडल?
देहरादून। उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी दून के शहर को स्मार्ट बनाने के लिए केन्द्र सरकार ने सैकडों करोड रूपया राज्य को दिया और जबसे स्मार्ट सिटी का निर्माण होने लगा था तब से ही यह बहस छिड गई थी कि क्या जिस रूप में शहर को सवारा जा रहा है उसे स्मार्ट सिटी कहा जा सकता है? स्मार्ट सिटी का रूप कई बडे राज्यों में शानदार नजर आता है लेकिन देहरादून का स्मार्ट शहर सिर्फ हवाबाजी में ही शायद स्मार्ट बनकर रह गया है? सड़कों पर जाम एक ही बारिश में डूबता शहर यह आज दूनवासियों को एक बडा दर्द दे रहा है और सवाल खडे हो रहे हैं कि सैकडों करोड रूपया खर्च होने के बावजूद भी अगर शहर के कुछ इलाके एक ही बारिश मंे पानी से डूबने लग जाते हैं तो उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनका शहर कितना स्मार्ट बना जिसका दंश उन्हें हर बारिश में झेलना पड़ता है? राजधानी में लगातार हो रही बारिश से उसका शहर जिस तरह से पानी में डूबा हुआ कई इलाकों में नजर आता है उससे शहर में बनी स्मार्ट सिटी एक तमाशा बनकर रह गई है?
पहाड़ों की गोद में बसा देहरादून कभी अपनी हरियाली, शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता था। लेकिन आज हर मूसलाधार बारिश के बाद यह शहर एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा दिखाई देता है, जिसका जवाब हर साल अधूरा रह जाता है। सवाल यह नहीं कि बारिश कितनी हुई, सवाल यह है कि आखिर हर बार राजधानी ही क्यों ठहर जाती है? बारिश की कुछ घंटों की बौछार ने एक बार फिर शहर की तैयारियों की परतें खोल दीं। कई प्रमुख मार्ग जलमग्न हो गए, चौराहे तालाब में तब्दील हो गए, वाहन लंबी कतारों में फंस गए और लोगों का रोजमर्रा का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर अस्पताल पहुंचने की कोशिश कर रहे मरीजों तक, हर वर्ग ने इस अव्यवस्था की कीमत चुकाई। दुकानों के बाहर जमा पानी ने व्यापारियों की चिंता बढ़ाई तो कार्यालयों तक पहुंचने की जद्दोजहद ने आम आदमी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर विकास की असली तस्वीर क्या है? पिछले कुछ वर्षों में राजधानी के विकास के नाम पर अनेक परियोजनाओं की घोषणा हुई। सड़कें बनीं, ड्रेनेज सिस्टम को मजबूत करने के दावे हुए और आधुनिक शहर का सपना दिखाया गया। लेकिन पहली तेज बारिश ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि यदि व्यवस्थाएं वास्तव में मजबूत हुई हैं तो हर मानसून में वही पुराने दृश्य क्यों दिखाई देते हैं? आखिर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जलभराव शहर की नियति क्यों बन जाता है?
हाल ही में नंदा की चौकी क्षेत्र में नव निर्मित पुल की एप्रोच सड़क का धंसना भी कई गंभीर सवाल छोड़ गया। किसी भी निर्माण कार्य की वास्तविक परीक्षा उद्घाटन के दिन नहीं, बल्कि पहली चुनौती के समय होती है। राहत कार्य तेजी से होना सराहनीय है, लेकिन जनता अब यह भी जानना चाहती है कि ऐसी नौबत आई ही क्यों। देहरादून की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि शहर का प्राकृतिक स्वरूप लगातार सिमटता जा रहा है। जिन जलधाराओं और नालों ने दशकों तक बारिश का पानी सहज रूप से बहाया, वे आज अतिक्रमण, अव्यवस्थित निर्माण और शहरी विस्तार के दबाव में सिकुड़ते चले गए। कंक्रीट का जंगल बढ़ता गया और प्रकृति के रास्ते कम होते गए। नतीजा यह है कि अब बारिश का पानी नालों में नहीं, बल्कि सड़कों पर अपना रास्ता तलाशता है। यह किसी एक विभाग या एक एजेंसी का सवाल नहीं है। यह पूरे शहरी नियोजन, निर्माण गुणवत्ता, रखरखाव और जवाबदेही की सामूहिक परीक्षा है। जनता यह नहीं जानना चाहती कि किस विभाग के पास कौन-सी फाइल लंबित है। वह सिर्फ इतना जानना चाहती है कि हर साल उसे वही परेशानी क्यों झेलनी पड़ती है, जबकि समाधान के दावे लगातार किए जाते हैं।
देहरादून उत्तराखंड की राजधानी है। यह केवल प्रशासन का केंद्र नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की पहचान भी है। यदि यही शहर हर मानसून में जलभराव, जाम और अव्यवस्था की तस्वीर पेश करेगा, तो विकास के बड़े-बड़े दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब समय आ गया है कि केवल राहत कार्यों से आगे बढ़कर उन कारणों की भी गंभीर समीक्षा की जाए, जिनकी वजह से हर बारिश के साथ राजधानी की मुश्किलें लौट आती हैं। विकास का वास्तविक अर्थ तभी सिद्ध होगा, जब देहरादून की सड़कें बारिश में डूबें नहीं, बल्कि व्यवस्था जनता के भरोसे पर खरी उतरे।

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