होमस्टे या हाई प्रोफाइल पार्टी हाउस?

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रिहायशी इलाकों में होमस्टे का नया ट्रेंड़
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। सरकार ने होमस्टे कल्चर को राज्य के अन्दर हरी झंडी दे रखी है लेकिन सबसे हैरानी वाली बात यह है कि होमस्टे की आड में ‘पार्टी विला’ का खेल चल रहा है? दून की कुछ कालोनियों में होमस्टे कल्चर से एक घमाशान मचा हुआ है। शांत कालोनियों में बदलता मिजाज और होमस्टे के नाम पर वहां क्या चल रहा है यह भी एक बहस का विषय बना हुआ है। बहस चल रही है कि कुछ होमस्टे कहीं हाई प्रोफाइल पार्टी हाउस तो नहीं बन गये क्योंकि दून के कई कालोनियों में होमस्टे का बढता कारोबार अब सवालों के घरे में भी आ रहा है क्योंिक होमस्टे के नाम पर रिहायशी माहौल बदलने से वहां की जांच कराने की भी मांग धीरे-धीरे चिंगारी की तरह सुलग रही है। रिहायशी इलाकों में होमस्टे का नया ट्रेंड बढने से नागरिकों में एक नई हलचल मचती हुई दिखाई दे रही है और यह बात उठ रही है कि क्या होटलों की तर्ज पर होमस्टे पर भी सिस्टम की निगरानी रहेगी जिससे कि वहां के माहौल में कोई अशांति फैलाने का खेल न खेल सके?
उत्तराखंड सरकार ने पहाड़ों में पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से होमस्टे योजना शुरू की थी। इस योजना ने हजारों परिवारों के लिए आय के नए अवसर भी पैदा किए। लेकिन अब राजधानी देहरादून के कुछ पॉश रिहायशी इलाकों में होमस्टे के संचालन के तरीके को लेकर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कुछ स्थानों पर होमस्टे के नाम पर होने वाली गतिविधियों से रिहायशी क्षेत्रों की शांति प्रभावित हो रही है। डालनवाला, राजपुर रोड, जाखन, वसंत विहार तथा अन्य कुछ रिहायशी क्षेत्रों के निवासियों का कहना है कि सप्ताहांत के दौरान कुछ परिसरों में देर रात तक गाड़ियों की आवाजाही, तेज संगीत और निजी आयोजनों जैसी गतिविधियां देखने को मिलती हैं। उनका कहना है कि यदि किसी परिसर का उपयोग केवल पर्यटकों के ठहरने तक सीमित नहीं है और उसका स्वरूप नियमित व्यावसायिक आयोजनों जैसा हो गया है, तो इसकी स्थिति संबंधित विभागों द्वारा स्पष्ट की जानी चाहिए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से शांत मानी जाने वाली कॉलोनियों में देर रात तक होने वाली गतिविधियों से बुजुर्गों, बच्चों और परिवारों को असुविधा होती है। पार्किंग की समस्या, रात में लगातार वाहन आना-जाना और शोर की शिकायतें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। नागरिकों का कहना है कि पर्यटन को बढ़ावा देने और रिहायशी क्षेत्रों की शांति बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। नागरिकों का यह भी कहना है कि यदि किसी परिसर में ऐसे आयोजन हो रहे हैं जिनके लिए अन्य प्रकार की वैधानिक स्वीकृतियों की आवश्यकता हो सकती है, तो संबंधित विभागों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी लागू नियमों का पालन किया जा रहा है। उनका मानना है कि समय-समय पर संयुक्त निरीक्षण से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है और वैध तरीके से संचालित होमस्टे की विश्वसनीयता भी बनी रहेगी। शहर के जानकारों का कहना है कि उत्तराखंड की होमस्टे नीति का उद्देश्य स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देना था। इसलिए यह आवश्यक है कि योजना का लाभ उसी भावना के अनुरूप मिले और कहीं भी नियमों के अनुपालन को लेकर यदि शिकायतें हैं तो उनका निष्पक्ष परीक्षण किया जाए। इससे एक ओर नागरिकों का विश्वास बढ़ेगा तो दूसरी ओर पर्यटन क्षेत्र की साख भी मजबूत होगी।
इस पूरे मुद्दे पर अब कई सवाल एक साथ उठ रहे हैं। क्या राजधानी में संचालित सभी होमस्टे निर्धारित मानकों के अनुरूप संचालित हो रहे हैं? क्या रिहायशी क्षेत्रों में होने वाली गतिविधियों की नियमित निगरानी की जाती है? क्या स्थानीय नागरिकों की शिकायतों पर संबंधित विभाग समयबद्ध कार्रवाई करते हैं? क्या पर्यटन विभाग, एमडीडीए, नगर निगम, पुलिस और अग्निशमन विभाग द्वारा संयुक्त निरीक्षण की व्यवस्था पर्याप्त है? यदि कहीं नियमों के उल्लंघन की शिकायत मिलती है तो उसके परीक्षण और कार्रवाई की प्रक्रिया क्या है? और क्या राजधानी के तेजी से बदलते शहरी स्वरूप को देखते हुए होमस्टे संचालन संबंधी दिशा-निर्देशों की समीक्षा की आवश्यकता है? स्थानीय लोगों का कहना है कि वे पर्यटन और होमस्टे व्यवस्था के विरोध में नहीं हैं, बल्कि चाहते हैं कि नियमों का पालन समान रूप से हो और रिहायशी क्षेत्रों की मूल पहचान तथा नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा प्रभावित न हो। अब निगाहें संबंधित विभागों पर हैं कि वे इन शिकायतों और सवालों के बीच वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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