निजी अस्पतालों पर आखिर कौन लगायेगा नकेल?
कुछ प्राइवेट अस्पतालों में मुर्दा को जिंदा दिखाने का दिखा तांडव
उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही राज्य की जनता के मन में एक आस थी कि राज्य के प्राइवेट अस्पतालों में मनमर्जी से वसूले जाने वाले पैसे पर नकेल लगाई जाये। अधिकांश प्राइवेट अस्पतालों में आज के इस दौर में इलाज इतना महंगा हो चुका है कि एक आम इंसान वहां अपना इलाज कराने का सपने में भी नहीं सोच सकता। हैरानी वाली बात है कि छोटे से छोटे इलाज में भी कुछ प्राइवेट अस्पताल वहां आने वाले मरीज को यह ज्ञान देते हैं कि उनके इलाज में कितने लाख रूपये का खर्चा आयेगा। सरकारें कभी भी प्राइवेट अस्पतालों की इस लूट पर नकेल लगाने में सफल नहीं हो पाई और हाल तो यह है कि कुछ प्राइवेट अस्पतालों की तो इंसानियत इतनी मर गई कि उन्होंने मुर्दे को भी जिंदा बताकर उसे कई-कई दिन तक वैलटिनेटर पर रखा और उनके इस शैतानपन का जब खुलासा हुआ तो बडा भूचाल मचा लेकिन सरकारें ऐसी हैवानियत पर घृतराष्ट्र बनी रही?
देहरादून। उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक गंभीर बहस फिर तेज हो गई है। सरकारी अस्पतालों में बढ़ते मरीजों का दबाव, विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी और सीमित संसाधनों के कारण बड़ी संख्या में लोग निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे निजी स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा बढ़ा है, वैसे-वैसे इलाज के खर्च, बिलिंग, पैकेज, जांच और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के लाभ को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रदेश में निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली की प्रभावी निगरानी हो रही है और क्या मरीजों के अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं?
जब किसी परिवार का सदस्य अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ता है, तब उसके सामने केवल एक ही उद्देश्य होता हैकृकिसी भी तरह मरीज की जान बच जाए। उस समय परिवार इलाज के हर विकल्प को अपनाने की कोशिश करता है। लेकिन कई परिवारों का कहना है कि इलाज के दौरान बढ़ते खर्च और बाद में मिलने वाले बिल उनके लिए अलग ही संकट खड़ा कर देते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर निजी अस्पतालों की शुल्क व्यवस्था को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं।
स्वास्थ्य सेवा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि निजी अस्पताल प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और अनेक अस्पताल बेहतर चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध करा रहे हैं। लेकिन यदि मरीजों की ओर से लगातार शुल्क, बिलिंग या उपचार प्रक्रिया को लेकर शिकायतें सामने आती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होना भी उतना ही आवश्यक है। पारदर्शिता जितनी मरीज के हित में है, उतनी ही ईमानदारी से काम करने वाले अस्पतालों के हित में भी है।
आयुष्मान योजना पर भी उठते रहे हैं सवाल
आयुष्मान भारत योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को कैशलेस इलाज उपलब्ध कराना है। लेकिन समय-समय पर कुछ मरीजों और उनके परिजनों ने यह शिकायत भी की है कि उन्हें योजना के तहत इलाज प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा या विभिन्न कारण बताए गए। यदि ऐसी शिकायतें सही हैं, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जहां नियमों का उल्लंघन मिले, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
क्या शुल्क व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है?
आम लोगों के बीच यह मांग लगातार उठ रही है कि निजी अस्पतालों में इलाज, जांच, ऑपरेशन, आईसीयू, रूम चार्ज और अन्य सेवाओं की दरें स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हों। मरीज या उसके परिजनों को इलाज शुरू होने से पहले संभावित खर्च की जानकारी दी जाए, ताकि बाद में विवाद की स्थिति न बने। स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता मरीज और अस्पतालकृदोनों के हित में है।
मजबूत निगरानी तंत्र की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग को निजी अस्पतालों का नियमित निरीक्षण, बिलिंग प्रणाली की समीक्षा, सरकारी योजनाओं के अनुपालन की जांच और शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करना चाहिए। यदि कहीं नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित संस्थान के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
मरीज ग्राहक नहीं, सबसे पहले इंसान है
स्वास्थ्य सेवा सामान्य व्यापार नहीं है। अस्पताल वह स्थान है जहां लोग सबसे कठिन समय में उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। इसलिए अस्पतालों की सबसे बड़ी पूंजी केवल आधुनिक मशीनें नहीं, बल्कि मरीज का विश्वास है। यही विश्वास किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की असली ताकत होता है। अब प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि क्या सरकार निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, शुल्क व्यवस्था और मरीजों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर व्यापक समीक्षा करेगी? क्या आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन पर और प्रभावी निगरानी होगी? क्या शिकायतों के समाधान के लिए ऐसी व्यवस्था बनेगी, जहां मरीज को समय पर न्याय मिल सके?
उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर यह बहस किसी एक अस्पताल या एक घटना की नहीं है। यह उस भरोसे की बहस है, जिसके सहारे एक परिवार अपने सबसे कठिन समय में अस्पताल का दरवाजा खटखटाता है। उस भरोसे को बनाए रखना सरकार, स्वास्थ्य विभाग और सभी स्वास्थ्य संस्थानों की साझा जिम्मेदारी है।