सरकारी रिकार्ड ने खोले हैरानी वाले ‘राज’
सिस्टम के जवाब से मचेगा नया तूफान
सरकार प्रमाण पत्रों की जांच कराने पर खामोश!
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। अधिवक्ता पिछले काफी समय से सरकार और मुख्य सचिव के पाले में गेंद डालकर यह कह चुके हैं कि जौनसार में अनुसूचित जनजाति के जो प्रमाण पत्र बांटे गये हैं वह फर्जी हैं क्योंकि वर्ष 2000 के बाद जिन्हें भी यह प्रमाण पत्र जिला प्रशासन द्वारा जारी किये गये हैं वह गलत हैं और इसकी उच्च स्तरीय जांच कर उन्हें नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए जो इन फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर सरकारी महकमों में नौकरी कर रहे हैं। अधिवक्ता ने जिला प्रशासन से जौनसार बाबर में अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र निर्गत किये जाने की जब सूचना मांगी तो तहसील कालसी ने गजब का प्रमाण दिया कि जौनसार बाबर में अनुसूचित जनजाति का मात्र एक ही समुदाय (जौनसारी) को अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र जारी किये गये हैं। एक ही समुदाय जौनसारी जिनका खान-पान, रहन-सहन, पहनावा बोली इंडो तिब्बतीयन जौनसारी है। अन्य जनजाति का समुदाय जनसार बाबर में निवास नहीं करते हैं।
जौनसार-बावर में अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्रों को लेकर वर्षों से उठ रही बहस अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां सरकार और प्रशासन के सामने कई असहज सवाल खड़े हो गए हैं। अधिवक्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी लगातार सरकार, मुख्य सचिव और जिला प्रशासन के समक्ष यह दावा करते रहे हैं कि वर्ष 2000 के बाद जारी किए गए अनेक अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जानी चाहिए। उनका आरोप है कि यदि जांच में कोई प्रमाणपत्र नियमों के विपरीत जारी पाया जाता है, तो ऐसे प्रमाणपत्र निरस्त किए जाएं और उनके आधार पर सरकारी सेवा प्राप्त करने वाले लोगों के विरुद्ध भी कानून के अनुरूप कार्रवाई हो।
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने तहसील कालसी से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत यह जानकारी मांगी कि जौनसार-बावर क्षेत्र में किन-किन समुदायों को अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। तहसील कालसी से मिले आधिकारिक उत्तर ने पूरे मामले को नई दिशा दे दी। सरकारी जवाब में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जौनसार-बावर क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र केवल ष्जौनसारीष् समुदाय को ही जारी किया गया है। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि जौनसारी समुदाय का खान-पान, रहन-सहन, पहनावा और बोली इंडो-तिब्बतीयन परंपरा से संबंधित है तथा जौनसार-बावर क्षेत्र में अन्य कोई जनजातीय समुदाय निवास नहीं करता। अब यही सरकारी जवाब कई नए सवालों को जन्म दे रहा है। यदि प्रशासन स्वयं यह स्वीकार कर रहा है कि अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र केवल जौनसारी समुदाय के लिए ही जारी किया गया है, तो फिर यह आवश्यक हो जाता है कि पिछले वर्षों में जारी सभी प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं किसी अन्य जाति, उपजाति या अपात्र व्यक्ति को तो अनुसूचित जनजाति का लाभ नहीं दिया गया।
अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी का कहना है कि यह मामला केवल एक प्रमाणपत्र का नहीं, बल्कि सरकारी नौकरियों, शिक्षा, पदोन्नति और संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि यदि किसी भी अपात्र व्यक्ति ने गलत प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी लाभ लिया है, तो यह वास्तविक पात्र अनुसूचित जनजाति के अधिकारों का हनन है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि पूरे जौनसार-बावर क्षेत्र में वर्ष 2000 के बाद जारी सभी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों की उच्च स्तरीय, निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराई जाए। यदि किसी भी स्तर पर फर्जीवाड़ा या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित अधिकारियों और लाभार्थियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अब निगाहें राज्य सरकार और जिला प्रशासन पर टिकी हैं। सवाल केवल इतना नहीं है कि प्रमाणपत्र किसे मिला, बल्कि यह भी है कि क्या सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों की कसौटी पर अब तक जारी सभी प्रमाणपत्र खरे उतरते हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर जांच के बिना नहीं मिल सकता, तो फिर निष्पक्ष जांच ही इस पूरे विवाद का अंतिम और सबसे विश्वसनीय समाधान साबित हो सकती है।