इतिहास के शिखर पर धामी

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राजनीतिक अस्थिरता की परंपरा तोड़ी
कठिन फैसलों और जनविश्वास के दम पर लिखी नई इबारत
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 4 जुलाई 2021 केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत थी। इसी दिन युवा विधायक पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और ऐसे समय में राज्य की कमान संभाली, जब कुछ ही महीनों के भीतर दो मुख्यमंत्री बदले जा चुके थे। राजनीतिक अस्थिरता उत्तराखंड की पहचान बनती जा रही थी और आम जनता भी मान चुकी थी कि इस राज्य में मुख्यमंत्री बदलना एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है। लेकिन पाँच वर्षों बाद तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। मुख्यमंत्री के रूप में पाँच साल का कार्यकाल पूरा करते हुए पुष्कर सिंह धामी न केवल उत्तराखंड के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा देने वाले मुख्यमंत्री बने हैं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के पहले ऐसे मुख्यमंत्री भी बने हैं जिन्होंने राज्य में अपना पाँच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया।
पुष्कर सिंह धामी के सामने शुरुआत से ही चुनौतियों का अंबार था। विपक्ष के हमले, नेतृत्व परिवर्तन की लगातार उड़ती अफवाहें, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक चुनौतियाँकृसब कुछ एक साथ था। वर्षों तक हर कुछ दिनों में मुख्यमंत्री बदलने की चर्चाएँ होती रहीं, लेकिन धामी ने जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि अपने काम से दिया। उन्होंने संगठन का विश्वास बनाए रखा और जनता का भरोसा लगातार मजबूत किया। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जा सकती है। साल 2022 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और नौकरी बेचने वाले गिरोहों की थी। लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर था और सरकार कठघरे में थी। ऐसे समय में धामी सरकार ने सख्त कार्रवाई का रास्ता चुना। भर्ती घोटालों में शामिल लोगों पर शिकंजा कसा गया, नकल विरोधी कानून लागू किया गया और भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया गया। इसके बाद हजारों युवाओं को निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से सरकारी सेवाओं में अवसर मिले, जिसने युवाओं के बीच सरकार की विश्वसनीयता को मजबूत किया।
इन पाँच वर्षों में सरकार ने कई ऐसे निर्णय लिए, जिनकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर तक हुई। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में पहल, धर्मांतरण विरोधी कानून, महिला सुरक्षा, निवेश को बढ़ावा, चारधाम यात्रा की बेहतर व्यवस्थाएँ, सड़क और बुनियादी ढाँचे का विस्तार, पर्यटन और रोजगार के क्षेत्र में प्रयासकृइन सभी ने सरकार की कार्यशैली को अलग पहचान दी। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक क्षेत्रवाद और जातीय समीकरणों के आरोपों से घिरी रही। कभी गढ़वाल-कुमाऊँ का मुद्दा उठा तो कभी जातीय संतुलन की राजनीति चर्चा में रही। लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं को इन विवादों से काफी हद तक दूर रखा। उनकी पहचान किसी क्षेत्र या जाति के नेता से अधिक एक निर्णय लेने वाले मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित हुई।
यह भी सच है कि हर सरकार की अपनी चुनौतियाँ और सीमाएँ होती हैं। आज भी बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्वतीय क्षेत्रों के विकास जैसे कई मुद्दों पर अपेक्षाएँ बनी हुई हैं। आने वाले वर्षों में इन्हीं मोर्चों पर सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। फिर भी यदि पिछले पाँच वर्षों का राजनीतिक मूल्यांकन किया जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड की राजनीति में स्थिर नेतृत्व की नई परिभाषा दी है। उन्होंने यह साबित किया कि यदि नेतृत्व स्पष्ट हो, निर्णय समय पर लिए जाएँ और जनता के बीच संवाद बना रहे, तो कठिन से कठिन राजनीतिक परिस्थितियों को भी अवसर में बदला जा सकता है। काँटों से भरे रास्ते पर शुरू हुआ यह सफर आज उपलब्धियों के एक ऐसे मुकाम पर पहुँचा है, जिसने उत्तराखंड की राजनीति में एक नई लकीर खींच दी है। आने वाले समय में इस लकीर तक पहुँचना किसी भी मुख्यमंत्री के लिए आसान चुनौती नहीं होगी।

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