सरकार के श्मार्गदर्शकश् त्रिवेन्द्र

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लगातार दे रहे है डबल इंजन को सलाह, सरकार को दिशा दिखा रहे टीएसआर
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प स्थिति देखने को मिल रही है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भले एक सांसद है, लेकिन सरकार के कामकाज और नीतिगत फैसलों पर उनकी सक्रिय टिप्पणियां लगातार चर्चा का विषय बनी हुई हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह एक वरिष्ठ अभिभावक की भूमिका में खड़े होकर सरकार को समय-समय पर दिशा दिखाते हुए सरकार के मार्गदर्शक बने हुए हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में चल रही सरकार को त्रिवेंद्र सिंह रावत ने खनन, शराब नीति, ट्रैफिक जाम, जमीन से जुड़े विवादों और पुलिस हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर खुलकर सलाह दी है। उनके बयानों में अक्सर यह संदेश झलकता है कि वह प्रदेश की नीतियों को लेकर सजग हैं और चाहते हैं कि सरकार संतुलित व दूरदर्शी फैसले ले।

खनन और शराब नीति पर सख्त रुख
पूर्व मुख्यमंत्री ने अवैध खनन के मुद्दे को कई बार उठाया है। उनका मानना रहा है कि खनन राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन इसकी आड़ में अवैध गतिविधियों को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर कहा है कि प्रशासन को पारदर्शिता के साथ काम करना चाहिए और स्थानीय पर्यावरण व जनता के हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए।
इसी तरह शराब नीति को लेकर भी उन्होंने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात कही। उनका कहना रहा है कि राजस्व बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। समाज में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए उन्होंने सरकार को कड़े नियंत्रण और जनजागरूकता अभियान तेज करने की सलाह दी है।

ट्रैफिक जाम और शहरी अव्यवस्था
देहरादून समेत राज्य के प्रमुख शहरों में बढ़ती ट्रैफिक समस्या को लेकर भी त्रिवेंद्र सिंह रावत मुखर रहे हैं। उनका मानना है कि अनियोजित शहरीकरण और बढ़ते वाहनों के दबाव ने राजधानी की तस्वीर बदल दी है। उन्होंने सुझाव दिया कि दीर्घकालिक ट्रैफिक प्रबंधन योजना तैयार की जाए, पार्किंग नीति को सख्ती से लागू किया जाए और सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया जाए।
पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के तहत केवल सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि मूलभूत यातायात सुधार पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

जमीन विवाद और पुलिस हस्तक्षेप
राज्य में जमीन से जुड़े विवादों और अतिक्रमण के मामलों पर भी उनका स्पष्ट मत रहा है। उन्होंने कहा है कि जमीन की खरीद-फरोख्त में पारदर्शिता और कड़ी निगरानी आवश्यक है, ताकि बाहरी निवेश के नाम पर स्थानीय हित प्रभावित न हों।
कुछ मामलों में पुलिस की भूमिका को लेकर भी उन्होंने टिप्पणी की है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए। उनका इशारा प्रशासनिक संतुलन और संवेदनशीलता की ओर रहा है।

देहरादून की हत्याओं पर सटीक टिप्पणी
हाल ही में देहरादून में हुई चर्चित हत्याओं के मामलों पर भी त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अपराध की बढ़ती घटनाएं समाज के लिए गंभीर संकेत हैं और पुलिस को न केवल त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि अपराध की जड़ों तक पहुंचकर रोकथाम की रणनीति बनानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है और जनता का भरोसा बनाए रखना सर्वोपरि है। अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक तंत्र को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है।

‘बड़े भाई’ की भूमिका में पूर्व मुख्यमंत्री
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत की यह सक्रियता केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि एक वरिष्ठ नेता के अनुभव का प्रतिबिंब है। वह सरकार की आलोचना करने के बजाय सुझाव देने की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे यह संदेश जाता है कि वह संगठन और सरकार दोनों के हित में अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं।
सत्ता परिवर्तन के बाद भी उनका यह रुख बताता है कि वह उत्तराखंड की नीतियों और प्रशासनिक दिशा को लेकर गंभीर हैं। चाहे मुद्दा खनन का हो या कानून-व्यवस्था का, उनकी टिप्पणियां यह संकेत देती हैं कि प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव और अनुभव अभी भी प्रासंगिक है।
स्पष्ट है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत आने वाले समय में भी राज्य के अहम मुद्दों पर अपनी राय रखते रहेंगे। अब देखना यह होगा कि उनकी सलाहों को सरकार किस हद तक अमल में लाती है और प्रदेश की राजनीति में यह ‘गार्जियन’ की भूमिका किस रूप में आकार लेती है।

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