सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना अवैध खनन!

0
164

राजनेता, सफेदपोश और अफसरों का गोपनीय गठजोड़?
त्रिवेंद्र ने टास्क फोर्स गठन करने का पढ़ाया था पाठ
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में जब भी किसी दल की सरकार सत्ता में आई तो राज्य के अन्दर अवैध खनन को लेकर विपक्ष सरकार को कटघरे मे खडा करता रहा और यहां तक आरोप लगते रहे कि अवैध खनन के काले कारोबार में काफी राजनेता, सफेदपोश और पर्दे के पीछे से काफी अफसर एक सिंडिकेट बनाकर अवैध खनन के कारोबार से अकूत दौलत कमाने का खेल खेलते रहे हैं और इस खेल को नेस्तनाबूत करने के लिए कभी भी किसी सरकार ने कोई धाकड़ शॉट मारा हो ऐसा शायद कभी देखने को ही नहीं मिला? सरकारों के मुखिया हमेशा अवैध खनन करने वाले माफियाओं पर नकेल लगाने के लिए दावे तो बडे-बडे करते चले गये लेकिन उनका यह दावा हमेशा धरातल पर टॉय-टॉय फिस्स होता हुआ ही नजर आया है? उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री ने हमेशा अवैध खनन करने वाले माफियाओं पर नकेल लगाने का दम भरा लेकिन हैरानी वाली बात है कि संसद में भाजपा के ही हरिद्वार सांसद ने जब राज्य में अवैध खनन होने और उस पर नकेल लगाने के लिए टास्क फोर्स का गठन करने की मांग की थी तो उस पर आज तक सरकार ने कोई अमल क्यों नहीं किया यह भी सरकार की निष्ठा पर एक सवाल खडे कर रहा है?
उत्तराखण्ड में खनन माफियाओं के खिलाफ मुख्यमंत्री ने शुरूआती दौर मे ही एक बडी दहाड़ लगा थी और उन्होंने दो टूक संदेश दिया था कि अगर राज्य के अन्दर किसी ने भी अवैध खनन करने का दुसाहस किया तो उसके खिलाफ सख्त एक्शन लिया जायेगा। मुख्यमंत्री के आदेश पर खनन माफियाओं के नेटवर्क को भेदने के लिए सिस्टम के अफसर शुरूआती दौर मे तो अगली पक्ति मे खडे हुये नजर आये लेकिन समय-समय पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के कुछ नेता राज्य के अन्दर खनन माफियाओं के अभेद नेटवर्क के चलते राज्य की नदियों का सीना चीरने का खुला आरोप लगाते आ रहे हैं। हैरानी वाली बात तो यह है कि जब हरिद्वार से भाजपा के ही सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सदन के अन्दर उत्तराखण्ड में अवैध खनन को लेकर अपनी बात रखी थी और उन्हांेने अवैध खनन के इस काले कारोबार को रोकने के लिए राज्य के अन्दर एक टास्क फोर्स गठित करने की भी मांग की थी। त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस प्रहार से सरकार के काफी नेता और अफसर हिल गये थे लेकिन सवाल जस का तस है कि आज तक अवैध खनन को रोकने के लिए सरकार ने टास्क फोर्स का गठन आखिर क्यों नहीं किया? चर्चाएं तो यहां तक हैं कि भाजपा के कुछ नेता, कुछ सफेदपोश और पर्दे के पीछे रहकर कुछ अफसर एक साथ आकर अवैध खनन के काले कारोबार से अकूत दौलत कमाने के ऐजेंडे पर आगे बडे हुये हैं जिनकी कुंडली खंगालने के लिए सरकार को गोपनीय रूप से जरूर आगे आना चाहिए जिससे यह राज खुल सके कि अवैध खनन किस तरह से एक सिंडिकेट के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना हुआ है।
हैरानी वाली बात है कि उत्तराखण्ड जबसे अस्तित्व मंे आया है तबसे राज्य में खनन माफियाओं का सिंडिकेट हर सरकार के अन्दर कैसे पॉवरफुल बनकर सरकार की नदियों का सीना चीरकर करोडो रूपये कमा रहा है और सरकार को इससे राजस्व की बडी हानि होती आ रही है लेकिन इसके बावजूद भी सरकार का सारा तंत्र खनन माफियाओं के सिंडिकेट के आगे क्यों खामोश रहता है यह आज भी एक रहस्य से ज्यादा कुछ नहीं दिखाई देता। अवैध खनन का काला खेल उत्तराखण्ड के अन्दर रहस्यमय बना हुआ है और यह बात हमेशा उभरती रही है कि आखिरकार वो कौन से पॉवरफुल चेहरे हैं जो हर सरकार के अन्दर अवैध खनन का काला कारोबार करने से तिनकाभर भी नहीं घबराते। हालांकि कांग्रेस शासनकाल में पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल मंे खनन माफियाओं पर नकेल लगाने के लिए माइनिंग विजिलेंस सेल का गठन किया था और उसके बाद माइनिंग विजिलेंस सेल ने अपनी सीमित टीम के साथ मिलकर अवैध खनन के बडे सिंडिकेटों पर प्रहार किया था और उस समय यह मांग भी प्रबल हुई थी कि माइनिंग विजिलेंस सेल को मजबूत करने के लिए उसका दायरा बढाया जाये लेकिन उस समय की सरकार ने ऐसा करने के लिए अपने कदम नहीं बढाये और जैसे ही राज्य में भाजपा की सरकार आई और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस के तहत सरकार चलाने का इरादा दिखाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ंिसह रावत ने सबसे पहले खनन माफियाओं की नाक में नकेल डालने के लिए बनी माइनिंग विजिलेंस सेल को ही बंद कर दिया था जिसके चलते खनन माफियाओं का हौसला इतना बडा था कि वह हर दिन राज्य के कई जिलों में खुलकर अवैध खनन का काला कारोबार करते हुए नजर आये थे। अब उत्तराखण्ड मंे पुष्कर सरकार सत्ता में है और उन्होंने अवैध खनन पर नकेल लगाने का आदेश तो दिया लेकिन इस आदेश का पालन हवाबाजी से ज्यादा कहीं दिखाई नहीं दे रहा है और कुछ जिलों मंे तो अवैध खनन का खुला तांडव मचना इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि आखिरकार खनन माफियाओं के सिंडिकेट में वो कौन चेहरे शामिल हैं जिनके शामिल होने से सिस्टम उन पर नकेल लगाने के लिए एक कदम भी आगे बढने का साहस नहीं दिखा पा रहा है। उत्तराखण्ड के कई जिलों में अवैध खनन का काला कारोबार एक रहस्यमय बना हुआ है और सरकार के अन्दर खनन माफियाओं पर नकेल लगाने का कोई जज्बा भी देखने को नहीं मिल रहा है क्योंकि अगर सरकार एक मजबूत इरादे से कुछ करने की ठान ले तो फिर सरकार से बडा कोई माफिया कैसे हो सकता है।

LEAVE A REPLY