नववर्ष को एक ही गीत गूंजा मुझे रोको न…

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आवाम की आजादी पर हुजूर न लगाओ ‘पहरा’
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड की राजधानी में आवाम आजादी के साथ जीने की मंशा पाले हुये है और उसे इस बात से काफी हैरानी होती है कि आखिरकार पुलिस प्रशासन उनकी आजादी पर पहरा लगाने के लिए क्यों रात ग्यारह बजे क्लबों और मनोरंजन स्थलों को बंद कराने का हुक्म दिये हुये है। नववर्ष की पूर्व संध्या पर राजधानी में चप्पे-चप्पे पर एक ही गीत गूंज रहा था कि मुझे रोको न…। क्लबों और मनोरजनों स्थलों पर नववर्ष मनाने की पार्टी में शामिल हुये लोगों को जिस आजादी के साथ वहां जश्न मनाते हुए देखा गया उससे यह बात तो एक बार फिर उभर कर सामने आ गई कि अब राजधानी का कलचर बदल गया है ऐसे में पुलिस प्रशासन को आवाम की आजादी पर पहरा लगाने का कोई हक सम्भवतः नहीं है क्योंकि आज उत्तराखण्ड की राजधानी में भी आवाम उसी तरह से आजाद होकर क्लबों व मनोरंजन स्थलों पर जश्न मनाने के लिए रोज जाना पसंद कर रहे हैं जैसे देश के बडे-बडे राज्यों में वहां लोग आजादी के साथ जश्न मनाने के लिए रातभर पार्टियों में थिरक रहे हैं।
नववर्ष की पूर्व संध्या पर राजधानी के कई होटलों व क्लबों में पार्टियों का आयोजन किया गया था और उसे दुल्हन की तरह सजाया हुआ था। जश्न में किसी भी प्रकार का कोई खलल न हो इसके लिए जनपद के पुलिस कप्तान अजय सिंह ने खुद मोर्चा संभाल रखा था और चप्पे-चप्पे पर पुलिस और कमांडो के दस्ते शहर में सडकों पर अपनी पैनी नजर बनाये हुये थे जिससे कि कोई असमाजिक तत्व या हुडदंगबाज शहर की फिजा को खराब न कर पाये। राजधानी के सभी क्लबों और मनोरंजन स्थलों पर पार्टियों का आयोजन चल रहा था और इन पार्टियों में आवाम आजादी के साथ नववर्ष का जश्न मनाने के लिए आगे बढ रखा था। जश्न में डूबे लोगों को क्लब और मनोरंजन स्थल के अंदर का दृश्य एक नई ऊर्जा दे रहा था और वहां मस्ती मे झूम रहे लोगों में जो एक नई ऊर्जा दिखाई दे रही थी उससे यह साफ नजर आ रहा था कि अब राजधानी में लोग आजादी के साथ क्लबों और मनोरंजन स्थल में देर रात तक पार्टियों का आयोजन करने का अपना सपना सच करने के लिए आगे बढ़ चुके हैं। क्लबों और मनोरंजन स्थल में आजादी के साथ वहां झूम रहे लोगों को देखकर यह आभास हो रहा था कि उन्हें ऐसी पार्टियां अब रास आने लगी हैं जो देर रात तक जश्न मे डूबी रहती हैं।
नववर्ष की पूर्व संध्या पर राजधानी के चप्पे-चप्पे पर एक गीत जरूर सुनने को मिल रहा था कि मुझे रोको न…. मुझे जाने दो…। पार्टी में हर कोई यही सोच मन में पाले हुये था कि रात ग्यारह बजे क्लबों और मनोरंजन स्थलों को बंद कराकर पुलिस प्रशासन आखिर क्यों उनकी आजादी पर पहरा लगा रहा है। दून जो कि बडे राज्यों के बडे-बडे शहरों की तर्ज पर रातभर रोशनी की चकाचौंध में गुलजार रहता है वहां अगर क्लबों और मनोरंजन स्थलों पर रात ग्यारह बजे तक का समय निर्धारित करना उन लोगों की आजादी पर एक आघात है जो ऐसे स्थलों पर अपने परिवार के साथ देर रात तक खुशियों के साथ हमेशा जश्न मनाने का एक सपना पाले हुये हैं। सरकार को भी इस बात पर मंथन और चिंतन करना चाहिए कि जो राजधानी चौबीस घंटे आवाम और पर्यटकों के लिए खुली रहनी चाहिए वहां रात ग्यारह बजे उसे बंद कराकर क्यों शहर को सुनसान किया जाता है।

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