संजीवनी रिजॉर्ट पर पुलिसिया एक्शन पर सवालों की ‘बौछारÓ

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देहरादून। संजीवनी रिजॉर्ट पर हुई छापेमारी के पीछे जो शख्स था, वो भी पुलिसिया कार्यवाही पर अब सवालिया निशान लगाने लगा है।
मानव – तस्करी के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने वाले ज्ञानेन्द्र कुमार को स्थानीय लोगों ने संजीवनी रिजॉर्ट में आये दिन चलने वाली रेव पार्टियों, देह व्यापार की खबर दी थी, जिसे उन्होंने पुलिस को बताया। ग्रामीणों ने ही उन्हें स्थानीय थाने की मिलीभगत के विषय में ही बताया था।अब ज्ञानेन्द्र कुमार सवाल उठा रहे हैं कि जब रिजॉर्ट संचालक अमित गर्ग, सतपाल तंवर और मुख्य प्रबंधक रणधीर सिंह मौके पर ही मौजूद थे तो वो भागने में कैसे कामयाब हो गये? अगर वो भाग भी गये थे तो पुलिस ने केवल अमित गर्ग को ही मुल्जिम क्यों बनाया? दो को आखिर किसके प्रभाव में बख्शा गया? मौके पर बरामद चरस जिस तरह छुपा कर रखी गई थी उससे यह स्पष्ट था कि यह चरस वहां बिक्री हेतु रखी गई थी लेकिन पुलिस ने अपनी रिपोर्ट से यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य किसके कहने पर गायब किया? रिजॉर्ट का वो कर्मचारी जो इस रैकेट के सभी सदस्यों और कार्यप्रणाली से बखूबी वाकिफ था उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? क्या इस वजह से कि वो पुलिस के उच्चाधिकारियों के समक्ष उन लोगों के नाम भी खोल देगा जो रिजॉर्ट से बाकायदा वसूली करते थे? फिर इस मुकदमे को दो हिस्सों एनडीपीएस और आईटीपीए में बांट दिया और दोनों के अलग अलग जांच अधिकारी बना दिये गये। ऐसा क्यों किया गया? आईटीपीए में जांच निरीक्षक स्तर का अधिकारी करता है। विकासनगर के कोतवाल शंकर सिंह बिष्ट योग्य और सक्षम अधिकारी हैं लेकिन विकासनगर जैसे संवेदनशील और व्यस्त थाने के प्रभारी भी। क्या यह अच्छा नहीं होता कि जांच अधिकारी एसटीएफ के किसी निरीक्षक को बना दिया जाता क्योंकि वहां सरप्लस इंस्पेक्टर हैं जो दोनों मामलों को कंपाईल करके जांच कर देते। ड्रग्स के मामले में स्थानीय थाने के ही एक उपनिरीक्षक को जांच अधिकारी बना दिया, जिसने रिजॉर्ट पर महज एक ताला लटकाने के और कुछ भी नहीं किया।
नशीले पदार्थों की बिक्री की धारायें बढ़ाई जानी चाहिये थी। अभी तक फरार अपराधियों की गिरफ्तारी के लिये एक भी प्रयास नहीं किया गया। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने सूचना पर कार्यवाही और छापेमारी पर जिस तरह की संवेदनशीलता दिखाई थी, उसकी सबसे ज्यादा जरूरत अब थी। लेकिन जिस तरह की स्थितियां सामने आ रही हैं, उससे तो लग रहा है कि उनके मातहत अधिकारी उन्हें भी गुमराह करने में कामयाब हो गये। पिछले डेढ़ साल से एक्टीविस्ट ज्ञानेन्द्र कुमार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। छापेमारी के दिन भी ज्ञानेन्द्र कुमार अत्यंत गंभीर स्वास्थ्य स्थिति में थे किंतु वो फिर भी कार्य करते रहे , छापे के बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, वो आज भी अस्पताल में ही हैं। ‘क्राईम स्टोरीÓ ने उनका साक्षात्कार वहीं जाकर लिया। अब वो अपनी सारी मेहनत पर पानी फिरता देखकर अत्यंत क्षुब्ध भी हैं और हतप्रभ भी।

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