विदेशी कनेक्शन के खुलासों ने बढ़ाई चिंता
पहाड़ से मैदान तक फैले कारोबार पर उठे बड़े सवाल
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड को नशामुक्त बनाने के लिए सरकार और पुलिस लगातार अभियान चला रही है। आए दिन नशा तस्करों की गिरफ्तारियां हो रही हैं, बड़ी मात्रा में स्मैक, चरस, गांजा, कोकीन और अन्य मादक पदार्थ बरामद किए जा रहे हैं। इसके बावजूद एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि राज्य गठन के बाद बीते करीब 25 वर्षों में नशे का कारोबार जिस तरह फैला है, उसने पूरे प्रदेश के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक नशे का जाल लगातार फैलता गया। सीमावर्ती क्षेत्रों, पर्यटन स्थलों और बड़े शहरों में सक्रिय तस्करों ने ऐसा नेटवर्क खड़ा कर लिया, जो समय के साथ और मजबूत होता दिखाई दे रहा है। हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें बाहरी राज्यों के साथ-साथ विदेशी नागरिकों की संलिप्तता भी जांच एजेंसियों के सामने आई है। इससे यह सवाल और गंभीर हो गया है कि आखिर उत्तराखंड में नशे का कारोबार कितनी गहराई तक अपनी पैठ बना चुका है। चिंता की बात यह है कि नशे का सबसे बड़ा निशाना युवा पीढ़ी बन रही है। कॉलेज, विश्वविद्यालय, औद्योगिक क्षेत्रों और तेजी से विकसित हो रहे शहरी इलाकों में नशे की उपलब्धता ने अभिभावकों और समाज दोनों की चिंता बढ़ा दी है। नशे का कारोबार केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक संकट का रूप भी लेता जा रहा है। कई परिवार नशे की वजह से टूट रहे हैं और अनेक युवाओं का भविष्य अंधकार में जा रहा है।
प्रदेश में पुलिस, एसटीएफ और अन्य एजेंसियों द्वारा लगातार कार्रवाई की जा रही है। कई बड़े तस्कर जेल भेजे गए हैं और करोड़ों रुपये के नशे की खेप पकड़ी गई है। इसके बावजूद सवाल यह उठता है कि जब छोटे-छोटे तस्कर पकड़े जा रहे हैं, तो आखिर इस पूरे नेटवर्क को संचालित करने वाले बड़े चेहरे कौन हैं? नशे का पैसा कहां से आ रहा है और इसकी सप्लाई चेन कैसे संचालित हो रही है? यह ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब आज भी पूरी तरह सामने नहीं आ सके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल गिरफ्तारी और बरामदगी से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए नशे के कारोबार की आर्थिक जड़ों पर प्रहार करना होगा, युवाओं को जागरूक बनाना होगा और समाज को भी इस लड़ाई में सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। जब तक नशा बेचने वालों, उन्हें संरक्षण देने वालों और पूरे नेटवर्क को संचालित करने वाले बड़े खिलाड़ियों तक कानून का शिकंजा नहीं पहुंचेगा, तब तक यह जंग अधूरी ही मानी जाएगी।
उत्तराखंड की पहचान आध्यात्म, संस्कृति, पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य से रही है। ऐसे में नशे का बढ़ता कारोबार केवल कानून के लिए नहीं, बल्कि देवभूमि की सामाजिक व्यवस्था और भविष्य के लिए भी एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है। अब प्रदेश की जनता की नजर इस बात पर है कि नशे के खिलाफ चल रही मुहिम केवल कार्रवाई तक सीमित रहती है या फिर इस काले कारोबार की जड़ों तक पहुंचकर इसे पूरी तरह खत्म करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए जाते हैं।