योगी हैं बाहुबली

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उत्तराखण्ड का लाल यूपी में करता धमाल
मजबूत शासन प्रदान कर कर रहे है कमाल
सहमे हुए माफिया-बदमाश, हुआ बुरा हाल
एक कुशल प्रशासक की खासियत यह होती है कि उसके द्वारा हर कदम जनता के हित में होता है और यदि कोई असामाजिक तत्व उसके सम्राज्य में जनता को परेशान करें तो यह प्रशासक का कर्तव्य होता है कि वह ऐसे असामाजिक तत्वों को निस्तानाबूद कर दें। इससे जनता के बीच में उस शासक की छवि में चार चांद लग जाते है। ब्लॉकबस्टर फिल्म बाहुबली में भी कुछ ऐसा ही दिखाया गया था। जिसमें कि बाहुबली नामक किरदार एक शासक का था जिसकी कुशलता को जनता ने प्रणाम कर उसे अपनी पलकों पर बिठाया। वहीं जब उसके साम्राज्य पर विदेशी आक्रांताओं द्वारा आक्रमण किया गया तो उसने अपने अदम्य साहस से उन आक्रांताओं को पराजित कर दिया। वैसे तो बाहुबली एक फिल्म थी लेकिन उसकी पटकथा काफी मायनों में उत्तर प्रदेश में धरातल पर उतरती हुई नजर आ रही है। जहां राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संभवतः बाहुबली का किरदार निभा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी ने जब से उत्तर प्रदेश जैसे संवेदनशील राज्य की कमान अपने हाथों मंे ली है वह तब से ही एक्शन में दिखाई दिए हैं। प्रदेश के विकास के साथ उसे अपराध मुक्त करने की दिशा में निरंतर उपयुक्त कदम उठा रहे हैं। माफियाराज और गुंडाराज पर उन्होंने जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रखी है। उनकी इस नीति के पूर्व में भी कई परिणाम सामने आते रहे है और एक तो कल उस समय देखने को मिल गया जब यूपी की एसटीएफ ने लाखों के ईनामी बदमाशों को मुठभेड़ में ढेर कर दिया। उत्तराखण्ड के इस लाल ने उत्तर प्रदेश में जो धमाल मचा रखा है उससे वहां से लेकर यहां तक की जनता गदगद नजर आ रही है। मजबूत शासन देने के साथ साथ उन्होंने यूपी के अंदर माफिया और बदमाशों में मन एक खौफ भी पैदा किया हुआ है। अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वह दिन दूर नहीं जब यूपी अपराध मुक्त कहलाने लगे?
आबादी की औसत के अनुसार देश का सबसे बड़ा राज्य कहे जाने वाला उत्तर प्रदेश की एक समय पहचान कुख्यात अपराधियों के गढ़ के रूप में होती थी। बदमाशों के आतंक का आलम यह था कि पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोग घरों से बाहर निकलने तक से डरते थे। उन्हें डर रहता था कि यदि वह घर से बाहर निकले तो कोई बदमाश उनके साथ लूटपाट या कोई अनहोनी न कर दे। वैसे यह बात तो अब पुराने दौर की ही लगती है क्योंकि जबसे योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की कमान संभाली है तबसे उत्तर प्रदेश की तस्वीर काफी हद तक बदली हुई नजर आ रही है। अपराधियों के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी ने जो जीरो टॉलरेंस अपनाई हुई है, उसने कई अपराधियों को रास्ते पर ला दिया है और अभी भी लाइन पर नहीं आए हैं उनके खिलाफ यूपी पुलिस ने मिशन चला रखा है। बताते चले कि फरवरी माह में यूपी में उमेश पाल की हत्या हुई थी। इस हत्या के आरोपी माफिया अतीक के बेटे असद और शूटर गुलाम की तलाश में यूपी पुलिस ने छापेमारी का अभियान चला रखा था। पुलिस ने बदमाशों को कल मुठभेड़ में मार गिराया। इस एनकाउंटर को लेकर काफी बहस छिड़ी हुई है। हालांकि अधिकांश लोग इसमें पुलिस की कार्रवाई के पक्ष में ही बात करते हुए नजर आ रहे है। एक समय में बदमाशों के प्रदेश के रूप में पहचान बनाने वाला यूपी अब पुलिस प्रशासन के जलवे के रूप में पहचान बना रहा है। इसका मुख्य कारण है कि राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस के आला अधिकारियों को यह साफ निर्देश दे रखे है कि किसी भी हाल में अपराधियों को बख्शना नहीं है और उनके खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत काम करना है।
बता दें कि पिछले दिनों कुछ राज्यों में कुछ ऐसी आपराधिक घटनाएं हुई हैं जिसने वहां के पुलिस प्रशासन के पसीने छुड़ा दिए। आगजनी और पत्थरबाजी की इन घटनाओं को देखते हुए इन राज्यों की सरकारों को उत्तर प्रदेश सरकार से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है जिन्होंने अपराधियों और असामाजिक तत्वों के मन पुलिस प्रशासन का ऐसा डर बैठा रखा है कि वह कोई भी गलत काम करने से पहले उसके अंजाम को अपने जहन में याद कर लेते है। बदमाशों के खिलाफ यूपी पुलिस द्वारा लगातार की जा रही कार्रवाई को देखकर अब देश की जनता यह कहने से शायद नहीं चूक रही होगी कि योगी है तो मुमकिन है……!

बॉक्स
अपना दून तो ऐसा न था?
आचार्य द्रोण की नगरी देहरादून की ख्याति पूरे विश्व में उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करने की है और यह ख्याति मात्र एक दो दशक से नहीं बल्कि सदियों से है। माना जाता है कि पिछले कई कालांशों से कई लोग यहां उच्च स्तरीय शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे आज भी आते है। शिक्षा का हब कहे जाने वाले दून का लगता है शायद किसी की नजर लग गई हैं? बीते दिनों थाना क्लेमेंटाउन क्षेत्र में हुई वारदात को देखकर ऐसा ही लगता है। अपना दून तो ऐसा न था? गैंगवार जैसे शब्द, जिन्होंने दून के समाचार पत्रों और न्यूज चौनलों से बहुत समय पहले ही दूरी बना ली थी, वह अब फिर सुर्खियों की शोभा बढ़ा रहे है। क्लेमेंटाउन क्षेत्र में हुई उस वारदात की सीसीटीवी फुटेज की वीडियो को देखकर तो ऐसा लग रहा था कि मानो किसी बॉलीवुड फिल्म में दो गुटों की लड़ाई का सीन चल रहा हो। वीडियों में दिखा की दोनों गुट ने एक दूसरे पर लाठी, डंडों और पत्थरों से हमले किए। बदमाशी की पराकाष्ठा को पार करने हमलावरों को देखकर ऐसा लगा मानो उनके मन पुलिस प्रशासन का कोई खौफ ही नहीं है। रह रहकर मन में यह सवाल हिलोरे ले रहा है कि बदमाशी का बीज दून में आखिर बो कौन रहा है? भले वारदात के बाद पुलिस ने बदमाशों को हिरासत में लिया हो लेकिन इससे उसकी निष्क्रियता नहीं छिप सकती। ऐसा नहीं है कि दून में सिर्फ और सिर्फ क्लेमेंटाउन थाना क्षेत्र में ही असमाजिक तत्वों का बोल बाला है। राजधानी के लगभग सभी थाना क्षेत्रों में अवैध खनन, अवैध शराब की बिक्री, जुएबाजी, सट्टेबाजी, नशीले पदार्थों की बिक्री, आदि अपराधिक गतिविधियां हो रही है। इतना सबकुछ चल रहा है लेकिन पुलिस एक्शन तभी लेगी जब उसे कोई सूचना देगा। पुलिस अधिकारी दम भरते नहीं थकते कि उनकी पुलिस लगातार गश्त करती रहती है और चीता के वाहन चप्पे-चप्पे पर नजर रखते है लेकिन हकीकत तो यह नहंी है। यदि यह ही हकीकत होती तो न तो शहर में अवैध खनन होता, न ही जुएबाजी-सट्टेबाजी होती, न अवैध शराब और अतरंगी नशा बिकता और न ही कत्ल होता। क्लेमेंटाउन की वारदात को संभवतः चादर उढ़ाने के लिए थानाध्यक्ष और दरोगा पर भले ही पुलिस कप्तान ने गाज गिरा दी हो लेकिन अगर वह शहर के सभी थाना क्षेत्रों का निरीक्षण स्वयं करेंगे तो हो सकता है कि पुलिस कर्मियों के निलंबन और लाइन हाजिर करने के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते करते उनके हाथ न दुःख जाएं?

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