सीएम के सूचना महकमें में फिल्मों का खेल!

0
139

प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का इतिहास रहा है कि सीएम के सूचना महकमें में हमेशा फिल्मों को बनाने के नाम पर बडा खेल चलता रहा है और यह खेल राज्य के हैंडसम और ताकतवर मुख्यमंत्री पुष्कर राज में भी चरम पर दिखाई दे रहा है इससे सवाल खडा हो रहा है कि आखिरकार कलमवीरों को सूचना महकमें ने जिस तरह से उन्हें फिल्म निर्माता बनाकर अपनी खुली मेहरबानी उन पर उडेल रखी है वह काफी हैरान करने जैसी ही नजर आ रही है? गजब की बात है कि सरकार को लेकर बनने वाली इन करोडो रूपये की फिल्मों को कहां और कौन देखता है इसका जवाब तो शायद सूचना महकमें के अफसरों के पास ही होगा? उत्तराखण्ड का सूचना विभाग लम्बाचौडा है और महकमें के अफसर चाहें तो वह दो लोगों को ठेके पर रखकर उनसे सरकार के प्रचार प्रसार की फिल्में कितनी भी बनवा सकते हैं जिससे हजारों करोड के कर्ज में दबी सरकार फिल्मों के खेल में दोनो हाथों से लुटाये जा रहे पैसे को बचाने में सफल हो जाये? उत्तराखण्ड में काफी कलमवीर जो वर्षों पूर्व टूटी चप्पलों में धूमा करते थे वह वर्षों से सरकार की फिल्मों को बनाने के खेल में आज अकूत सम्पत्ति के मालिक बन चुके हैं अगर सरकार इन फिल्मों के नाम पर हो रहे खेल का असली सच जानने के लिए कुछ ईमानदार अफसरों को इसकी जांच सौंप दें तो उससे एक बडा घोटाला सामने आ सकता है कि सूचना महकमें में वर्षों से फिल्मों को बनाने की जो बंदरबांट का खेल चला आ रहा है उस खेल के पीछे क्या-क्या खेल खेले गये हैं?
हैरानी वाली बात है कि सरकार के ऊपर हजार करोड का कर्ज हो रखा है और वह राज्य की जनता को महंगाई का बार-बार करंट लगाकर उसे एक के बाद एक झटका देती आ रही है लेकिन वह अपने प्रचार-प्रसार में अपनी उपलब्धियों की फिल्में बनवाकर उन्हें काफी टीवी चैनलों में चलवाने में कोई कसर नहीं छोड रही है? सवाल यह तैर रहे हैं कि आखिरकार सरकार की उपलब्धियों की बनी फिल्में क्या राज्यवासी अपने घरों में लगे टीवी चैनलों पर देख रही है या फिर मीडिया को अपनी सरकार का गुणगान कराने के लिए कलमवीरों को फिल्में बनाने का गिफ्ट दिया जा रहा है? उत्तराखण्ड में वर्षों से देखने में आ रहा है कि सरकारें अपना प्रचार प्रसार करने के लिए कोई कमी नहीं छोड रही और उसके लिए वह काफी कलमवीरों को फिल्में बनाने का ऑडर देकर उन्हें अपने चैनल व और चैनलों में चलवाने के लिए आगे आती रही है जिससे राज्यवासियों के टैक्स का पैसा बर्बाद किया जा रहा है? हैरानी वाली बात है कि जब सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना बिगुल बजा चुकी है और राज्यवासियों के सामने सरकार को ताकतवर और हैंडसम बताया जा रहा है तो फिर आखिर सरकार को अपना प्रचार प्रसार करने की ऐसी जरूरत क्या आ रखी है कि वह अपने प्रचार प्रसार के लिए करोडो रूपये की फिल्में बनाने के एजेंडे पर आगे बढती जा रही है? उत्तराखण्ड का सूचना महकमा काफी लम्बाचौडा है और राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास खुद सूचना विभाग है ऐसे में उन्हें इस बात की खुद समीक्षा करनी चाहिए कि सरकार के प्रचार प्रसार के लिए जो फिल्मों पर लम्बाचौडा बजट खर्च होता है उसे बिलकुल सूक्ष्म करने के लिए क्यों न ठेके पर दो ऐसे युवाओं को विभाग में फिल्में बनाने का जिम्मा सौंप दिया जाये जिससे जो फिल्में करोडो में बनती हैं वह मात्र एक-दो लाख में ही बन जायें? उत्तराखण्ड के अन्दर आवाम को सरकार से जो उम्मीद नजर आ रही थी वह उम्मीद उसकी इसलिए भी धूमिल हो रही है क्योंकि जिस तरह से आये दिन बिजली-पानी का रेट उन्हे बडा करंट दे रहा है वह सरकार की कार्य कुशलता को कटघरे में लाकर खडा कर रहा है? उत्तराखण्ड का इतिहास रहा है कि जब भी कुछ मीडियाकर्मियों ने सरकार को आईना दिखाने के लिए अपनी कलम को सत्य की राह पर चलाया तो कुछ मीडियाकर्मियों के खिलाफ फर्जी राजद्रोह से लेकर एक साजिश के तहत संगीन धाराओं में मुकदमें दर्ज किये गये और तो और कुछ मीडियाकर्मियों के सूचना विभाग ने कुछ सरकारों के कार्यकाल में इसलिए विज्ञापन रोक दिये थे क्योंकि वह अपनी कलम को गुलामियत की जंजीरों में कैद करने से खुला इंकार कर चुके थे?

LEAVE A REPLY