प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का जब से जन्म हुआ है तब से राज्य के अन्दर सत्ता में रहने वाले कुछ राजनेताओं और सफेदपोशों को हमेशा इस बात का भय बना रहता है कि कहीं उनकी कुर्सी पर कोई आंच न जाये जिसके चलते वह अपने तीर्थ पुरोहितों के मायाजाल में फंसकर उन्हें अपनी कुंडली का योग दिखाते हैं और उसके बाद कुछ तीर्थ पुरोहितों को अपने जजमान राजनेता को कुंडली में आये योग को लेकर उन्हें वह तंत्रमंत्र में उलझाने का ऐसा पासा फेंकते हैं कि कुछ राजनेता और कुछ सफेदपोश अपने तीर्थ पुरोहितों के इशारे पर नाचना शुरू कर देते हैं और उन्हें इस बात का भय रहता है कि अगर उन्होंने अपने तीर्थ पुरोहित के कहने पर अपने कदम आगे नहीं बढाये तो उनकी राजनीति पर संकट के बादल गहरा सकते हैं? हैरानी वाली बात है कि उत्तराखण्ड के काफी अफसरों को भी तंत्रमंत्र का सहारा लेते हुए देखा गया है और उन्हें जब भी इस बात की शंका होती है कि उनकी कुर्सी पर कभी भी ग्रहण लग सकता है तो वह कुछ तंात्रिकों की शरण में जाकर तंत्रमंत्र के सहारे अपनी कुर्सी को बचाने के मिशन में आगे बढने के लिए आ जाते हैं? उत्तराखण्ड में तीर्थ पुरोहितों द्वारा बाइस साल से अपने जजमान राजनेताओं को उनकी कुंडली में दोष गुण बताकर वह उनके इष्ट देवता बनने का जो खेल खेलते आ रहे हैं वह कई राजनेताओं के लिए कष्टदायी भी बना है? कुछ राजनेताओं की कुर्सी पर जब संकट आया तो यह तीर्थ पुरोहित और तांत्रिक भी उनकी कुर्सी नहीं बचा पाये थे?
उत्तराखण्ड की राजनीति का जो परिदृश्य बाइस सालों से देखने को मिल रहा है कि राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी होने वाले एकमात्र पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी ऐसे राजनेता थे जिन्होंने पांच साल तक सत्ता पर राज किया हालांकि उनकी सत्ता को हिलाने में पार्टी के ही कुछ बडे राजनेताओं का जो रोल उस समय देखने को मिलता था उससे हमेशा ऐसा आभास होता था कि कब स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी की कुर्सी उनसे छीन जायेगी लेकिन उन्होंने अपनी राजनीति कुशलता से पांच साल तक अपनी सत्ता को अभेद बनाकर रखा था। स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी से पहले और बाद में राज्य की सत्ता जितने भी पूर्व मुख्यमंत्रियों को सौंपी गई वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये थे। उत्तराखण्ड में लम्बे अर्से से देखने में आ रहा है कि सत्ता में शामिल कुछ राजनेता, सफेदपोश और अफसर अपनी कुर्सी बचाये रखने और अपनी राजनीति को ऊंचाई तक ले जाने के लिए वे अपने तीर्थ पुरोहितों और तांत्रिकों के भ्रमजाल में इस कदर उलझ जाते हैं कि वह उन्हें ही अपना इष्ट देवता समझने लगते हैं और काफी राजनेताओं और अफसरों की कुंडली का भविष्य बताने वाले उनके तीर्थ पुरोहित और तांत्रिक उन्हें हर मुश्किल काल में बचाने का उन्हें विश्वास दिलाते हैं जिसके चलते ऐसे तीर्थ पुरोहित और तांत्रिक राज्य के अन्दर अपने आपको पॉवरफुल दिखाकर जिस तरह से आवाम को मूर्ख बनाने के एजेंडे पर आगे बढते जा रहे हैं उसका सच अब राज्य की काफी जनता जानने व पहचानने लगी है? देखने में आ रहा है कि कुछ राजनेताओं और अफसरों के तीर्थ पुरोहित इनके साथ अपनी फोटो खिंचवाकर उसके सहारे आवाम को यह दिखाने का खेल खेलते हैं कि उन पर किस तरह से बडे-बडे राजनेता और अफसर उनकी विद्या पर विश्वास करते हैं और इसी के चलते वह कुछ राजनेताओं और अफसरों को वह उस दिशा में ले जाने के लिए भी एक सोची समझी रणनीति के तहत आगे बढ जाते हैं जहां उस राजनेता को ऐसे अंधकारमय द्वार पर खडा हो जाना पडता है जहां उसे वहां से निकलने का कोई रास्ता ही नजर नहीं आता और उसके बाद उनकी सत्ता उनके हाथ से ऐसे फिसल जाती है जैसे बंद मुठ्ठी में कैद की गई रेत चंद समय में ही हाथ से फिसल जाती है?