देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव से पूर्व कांग्रेस के सभी दिग्गज नेताओं को इस बात का भरोसा था कि त्रिवेन्द्र शासनकाल के चार साल राज से आहत राज्यवासी कांग्रेस को सत्ता सौंप देंगे और यही कारण था कि चुनाव से पूर्व जहां कांग्रेस को एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लडने के लिए आगे आना चाहिए था वह अपने इस मिशन से भटक गई और कांग्रेस के कुछ नेता अपने आपको मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानकर चुनावी मैदान में उतर आये और उसी का परिणाम रहा कि कांग्रेस के दिग्गज नेता विधानसभा चुनाव एकसाथ एक मंच पर लडने के लिए आगे नहीं आये और राजनीति के चाणक्य बन चुके राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने अल्प कार्यकाल में समूची पार्टी और संगठन को एक धागे में पिरोकर चुनावी रणभूमि में कांग्रेस को ललकारा और इस ललकार के आगे कांग्रेस कहीं नहीं टिकी और राज्य के इतिहास में चला आ रहा मिथक टूट गया और भाजपा एक बार फिर राज्य में सत्ता पर काबिज हो गई। भाजपा की जीत के बाद कांग्रेस के कई बडे नेताओं ने अपनी हार को लेकर जिस तरह से एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की बारिश की वह किसी से छिपा नहीं है और चुनाव के बाद से जिस तरह से कांग्रेस के कई नेता भाजपा में एंट्री लेने के लिए आगे बढे उससे राज्य के अन्दर कांग्रेस बिखरी-बिखरी नजर आ रही है? कांग्रेस एक मंच पर इसलिए भी खडी नहीं हो पा रही है क्योंकि कांग्रेस के कुछ बडे राजनेताओं को यह दिखाई दे रहा है कि हरदा अपने आपको पार्टी का सर्वे सर्वो समझकर कहीं भी और कभी भी धरना प्रदर्शन करने के लिए अपनी टीम के साथ मैदान में उतर जाते हैं? हरिद्वार में कोतवाली के बाहर धरना देना हो या फिर गांधी पार्क के बाहर अंकिता भण्डारी हत्याकांड में हरीश रावत द्वारा वीआईपी के नाम को लेकर धरना दिया गया हो उस सब में कांग्रेस का कहीं झण्डा डंडा दिखाई न देने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मन में भी एक बडी पीडा देखने को मिली जिससे सवाल खडे होने शुरू हो गये हैं कि अगर कांग्रेस इसी तरह से बिखरी-बिखरी नजर आती रही तो 2०24 में होने वाले लोकसभा चुनाव में वह भाजपा के लिए उत्तराखण्ड में कहीं चुनौती नहीं बन पायेंगे?
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड का इतिहास रहा है कि कांग्रेस व भाजपा पांच-पांच साल तक सत्ता सम्भालती रही लेकिन अचानक जिस तरह से राज्य में विधानसभा चुनाव से पूर्व कांग्रेस के कुछ नेताओं के मन में चुनावी जीत से पहले ही मुख्यमंत्री बनने की अभिलाषा जागने लगी थी उसके बाद से ही यह साफ नजर आ रहा था कि कांग्रेेस का मुकाबला भाजपा से नहीं बल्कि कांग्रेस का मुकाबला कांग्रेस से ही होगा? हरीश रावत और प्रीतम सिंह के बीच बार-बार चले वॉकयुद्ध से कांग्रेस के अन्दर एक बिखराव देखने को मिलने लगा था और यही कारण था कि कांग्रेस के कुछ बडे नेताओं के आपसी टकराव के चलते राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य में भाजपा को जीत दिलाने के लिए सबसे पहले पार्टी संगठन व सभी कार्यकर्ताओं को एकसाथ चुनाव मैदान में उतारने का खाका बनाया और शक्ति बनकर वह चुनाव मैदान में उतरी उसी का परिणाम रहा कि राज्य के अन्दर पांच साल में सरकार बदलने का चला आ रहा मिथक पुष्कर सिंह धामी ने तोड दिया था और भाजपा हाईकमान ने पुष्कर सिंह धामी पर एक बडा विश्वास दिखाते हुए उन्हें ही मुख्यमंत्री की कमान सौंपी जिससे यह साबित हो गया था कि पुष्कर सिंह धामी ने अपनी स्वच्छ राजनीति के प्रदर्शन से भाजपा हाईकमान को किस तरह से प्रभावित कर दिया था। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद पार्टी के कई नेताओं के बीच जमकर घमासान मचा और चुनाव में मिली हार का ठीकरा कुछ नेताओं ने एक दूसरे पर थोपा। कांग्रेस के कई नेताओं को इस बात का आभास होने लगा कि पार्टी के कुछ दिग्गज नेताओं के बीच जिस तरह से आपसी द्वंद चल रहा है उससे राज्य के अन्दर कांग्रेस का वजूद धीरे-धीरे कम हो जायेगा और यही कारण है कि हरिद्वार में हुये पंचायत चुनाव में कुछ कांग्रेसी नेताओं ने भाजपा का दामन थामा और वहां भाजपा ने जिस तरह से पंचायत चुनाव में अपना वर्चस्व कायम किया उससे कांग्रेस के माथे पर बल पड गये? कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को लेकर पार्टी के ही कुछ नेताओं में यह सोच पैदा हो गई है कि हरदा अपने आपको पार्टी समझने लगे हैं और वह कई बार पार्टी नेताओं से बात किये बिना ही कहीं भी धरना प्रदर्शन करने के लिए आगे आ जाते हैं? हरिद्वार में एक कोतवाली के बाहर जिस तरह से हरीश रावत ने कई दिन तक धरना प्रदर्शन किया और उसके बाद गांधी पार्क के बाहर उन्होंने अंकिता भण्डारी हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने और वीआईपी का नाम सार्वजनिक किये जाने को लेकर जिस तरह से चौबीस घंटे का धरना दिया उससे पार्टी के कुछ नेता नजर आये और उन्होंने दबी जुबान में यह भी कहा कि अगर हरीश रावत को गांधी पार्क के बाहर धरना प्रदर्शन करना था तो उन्हें समूची कांग्रेस को साथ लेना चाहिए था और वहां कांग्रेस के झण्डे डंडे भी पार्टी कार्यकर्ताओं को एक बल देते लेकिन वहां ऐसा नहीं हुआ? कांग्रेस के कुछ और नेताओं में जिस तरह से अपनी पार्टी में दिख रहा बिखराव नजर आ रहा है उससे कांग्रेस के कुछ और नेता भाजपा की ओर अपने कदम बढा लेंगे इसमें भी कोई शंका नहीं है?