सरकारी अस्पतालों में लाश का तमाशा!

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। हैरानी वाली बात यह है कि एक ओर तो स्वास्थ्य महकमें के सचिव सरकारी अस्पतालों में इलाज को बेहतर बनाने की दिशा में मैदान से लेकर पहाड तक में अपने विजन को आगे बढा रहे हैं लेकिन इसके बावजूद भी अगर कुछ सरकारी अस्पतालों में बीमारी से हुई मौत के बाद भी लाश का तमाशा बनाकर उसका पोस्टमार्टम कराने के लिए मृतक के परिजनों पर दबाव बनाया जा रहा है ऐसे में सवाल खडे हो रहे हैं कि जब कोई मरीज अपनी बीमारी से मर रहा है तो उसका पोस्टमार्टम कराने का औचित्य क्या है जबकि उसका परिवार पोस्टमार्टम कराने के लिए तैयार ही न हो?
उत्तराखण्ड की राजधानी में पिछले कुछ समय से देखने में आ रहा है कि अगर कोई व्यक्ति सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान मर रहा है तो उसका पोस्टमार्टम कराने के लिए क्यों मृतक के परिजनों पर दबाव बनाया जा रहा है यह समझ से परे है? बतादें कि कुछ समय पूर्व प्रेमनगर के सरकारी अस्पताल में वहीं के एक सत्तर वर्षीय मोहन कुमार को अस्पताल लाया गया लेकिन वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था और उसके बाद उसका पोस्टमार्टम कराने के लिए परिवार को कहा गया तो परिवार ने पुलिस को मृतक के बीमारी के इलाज के सभी पर्चे दिखाये लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें पोस्टमार्टम के लिए कहा गया तो परिवार ने बाद में डीएम से मुलाकात कर उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया तो उसके बाद उसका पोस्टमार्टम नहीं हुआ। वहीं चकराता निवासी 65 वर्षीय मोहन सिंह को राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में ग्यारह दिसम्बर को भर्ती कराया गया था जहां उसकी आज मौत हो गई लेकिन अस्पताल प्रशासन ने कहा कि मृतक का पोस्टमार्टम होगा जबकि उसके परिजनों का कहना था कि न तो मोहन सिंह का कोई एक्सिडेंट हुआ और न ही कोई वारदात में उन्हें चोट लगी तो फिर उसका पोस्टमार्टम क्यों हो रहा है? हालांकि बाद में परिजनों ने कहा कि पोस्टमार्टम कराना है तो करा दो।

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