पूर्व विधायकों ने खेला सरकार पर दबाव का खेल!

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पुष्कर राज में हर तरफ दिख रहा सकून
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में बाइस सालों तक सरकार चलाने वाले अधिकांश पूर्व मुख्यमंत्रियों को लेकर आवाम के मन में हमेशा एक बडी नाराजगी रही कि जिस उद्देश्य के लिए उन्हें सत्ता पर आसीन किया गया था उस पर वह कभी भी खरे नहीं उतरे? अधिकांश पूर्व मुख्यमंत्रियों ने सत्ता चलाने के लिए अहंकार और हिटलरशाही को अपना पैमाना माना और जिसने भी सरकार के आंगन में चल रहे भ्रष्टाचार और घोटालों के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो उनकी आवाज को कुचलने का षडयंत्र रचा गया इतना ही नहीं कुछ के खिलाफ फर्जी मुकदमें और फर्जी राजद्रोह का मुकदमा त्रिवेन्द्र शासनकाल में दर्ज हुआ जिसको लेकर राज्यवासियों में इस बात को लेकर गुस्सा दिखा कि क्या किसी राजनेता को इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलती है कि वह विकास की बजाए भ्रष्टाचार पर घृतराष्ट्र बन जाये? हैरानी वाली बात है कि राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में जहां हर तरफ आवाम को सकून मिल रहा है वहीं राज्य के अन्दर विकास का पहिया तेजी से आगे बढता जा रहा है जिसको लेकर राज्य की जनता तो पुष्कर राज में अपने आपको सुरक्षित महसूस कर रही है लेकिन इसी बीच जिस तरह से राज्य के काफी पूर्व विधायकों ने पूर्व विधायक संगठन का गठन किया है उससे बहस छिड रही है कि क्या इस संगठन का गठन सरकार पर दबाव बनाने के लिए किया गया है? पुष्कर राज में कब और कहां किसके साथ नाइंसाफी हुई यह बताने के लिए आज तक विपक्ष भी आगे नहीं आ पाया क्योंकि पुष्कर राज में ऐसा कुछ घटित ही नहीं हुआ जिस पर विपक्ष सरकार पर प्रहार कर सके?
उल्लेखनीय है कि राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी प्रदेश के पहले ऐसे मुख्यमंत्री बन गये हैं जिन्हांेने राज्य की अफसरशाही को यह तेरी फाइल और यह मेरी फाइल को लेकर उन्हें कटघरे में खडा किया है और तो और राज्य के मुख्य सचिव डा0 एसएस संधू ने भी मसूरी में तीन दिन तक चले चिंतन शिविर में साफ कहा कि कुछ अफसर ईगो में रहते हैं और उनके पास कोई भी काम कराने के लिए आता है तो वह उसे तुरंत ना बोल देते हैं तथा बाद में बखान करते हैं कि उन्हांेंने एक फाइल को देखते ही वापस लौटा दिया था। मुख्य सचिव ने ऐसे अफसरों को अपनी कार्यशैली मंे सुधार लाने और ईगो पालने पर वीआरएस लेने तक का पाठ पढा दिया था। इससे अफसरशाही को तो साफ संदेश चला गया कि राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उत्तराखण्ड के अन्दर बेहतर कार्य संस्कृति बनाने को लेकर हमेशा एक बडा विजन रखे हुये हैं और मुख्यमंत्री के इस विजन से राज्य की जनता के मन मंे भी अब एक आशा की किरण दिखाई देने लगी है कि जो सरकारी अफसर अपने आपको सरकार के दफतर में बैठकर आवाम को नजरअंदाज करता था वह अफसर अब शायद अपने में नया बदलाव लाकर अपनी ईगो को त्याग देगा? फिल्म उद्योग से युवाओं को बडे रोजगार से जोडने के लिए एक बडा खाका मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तैयार किया है और उसे वह अपने विशेष प्रमुख सचिव अभिनव कुमार के साथ धरातल पर उतारने में लगे हुये हैं। उत्तराखण्ड जहां विकास की राह पर अब आगे बढ रहा है वहीं अचानक राज्य के पूर्व विधायकों का एकसाथ लामबंद होकर विधायक संगठन का गठन करना कई सवालों को जन्म दे रहा है? दावा किया जा रहा है कि इस संगठन मंे सभी दलों के पूर्व विधायक शामिल हैं जिनकी संख्या 148 तक पहुंच सकती है। अंतरिम सरकार में मंत्री रहे लाखीराम जोशी को संगठन की कमान सौंपी गई है वहीं पूर्व विधायक भीम लाल आर्य को संगठन का सचिव बनाया गया है। पूर्व विधायकों का संगठन यमुना कालोनी में विधानसभा अध्यक्ष से उनके सरकारी आवास पर मिला और उनसे संरक्षण मांगा और स्पीकर से विधानसभा समिति की तरह ही पूर्व विधायकों की भी एक संवैधानिक समिति बनाने का अनुरोध किया जिस पर स्पीकर ने इस सुझाव का स्वागत किया। लाखीराम जोशी के हाथ मंे जैसे ही संगठन की कमान आई तो उन्होंने दिसम्बर में पूर्व विधायकों का एक सेमिनार देहरादून में आयोजित करने का भी दम भरा और उनका कहना है कि यह गैर राजनीतिक संगठन है और राज्य के ज्वलंत मुद्दों को सरकार के समक्ष रखेगा। लाखीराम जोशी का यह भी आरोप है कि पूर्व विधायकों को सरकार महत्व नहीं दे रही। अब सबसे बडा सवाल यह है कि आखिरकार अचानक पूर्व विधायकों का इस संगठन को बनाने को लेकर क्या विजन है यह तो अभी भविष्य के गर्त में कैद है लेकिन जिस तरह से पूर्व विधायकों ने यह संगठन बनाने का दम भरा है उससे यह बहस भी शुरू हो गई है कि क्या सरकार पर दबाव बनाने के लिए पूर्व विधायकों ने एक छतरी के नीचे आने का प्लान तो नहीं तैयार किया?

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