प्रमुख संवाददाता
देहरादून। गजब की बात है कि राज्य के जिस मुख्यमंत्री ने उत्तराखण्ड को आदर्श राज्य बनाने के लिए भ्रष्टाचार और घोटालेबाजों पर अपना चाबुक चलाकर राज्य की जनता को संदेश दिया है कि अब उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार करने वाला कोई भी नहीं बच पायेगा। मुख्यमंत्री ने राज्य को भ्रष्टाचारमुक्त करने की दिशा में जिस तरह से पंख लगायें हैं उससे राज्य की जनता के मन में तो एक नई आशा की किरण जाग गई है कि अब उनका उत्तराखण्ड उनके सपनों का राज्य बनेगा लेकिन लगता है कि भाजपा के ही कुछ राजनेताओं को पुष्कर सिंह धामी का भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लडना रास नहीं आ रहा है? कभी भाजपा का कोई दिग्गज पुष्कर सरकार को कटघरे में खडा कर रहा है तो कभी पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ंिसह रावत ने अपनी ही सरकार को घेरने का काम किया और सरकार ने जिस तरह से सैकडों करोड रूपये की मनी लॉडरिंग मामले में पूर्व मुख्यमंत्री के औद्योगिक सलाहकार की पत्नी की कम्पनी के खिलाफ अपराध शाखा को जांच सौंपी है उससे कहीं न कहीं पूर्व मुख्यमंत्री भी इस जांच को लेकर असहज नजर आ रहे हैं? ऐसे में राज्य के अन्दर बहस छिड गई है कि क्या भ्रष्टाचारियों से लडने का गुनाह सीएम को भुगतना पड रहा है? अब तो राज्य के अन्दर यह बहस भी चल रही है कि आखिर मोदी के सखा के खिलाफ वो कौन चेहरे हैं जो पर्दे के पीछे रहकर साजिशों की स्क्रीप्ट लिख रहे हैं? हैरानी वाली बात है कि जहां भाजपा हाईकमान गुजरात व दिल्ली में होने वाले चुनाव को लेकर वहां जीत का प्लान तैयार कर रहा है वहीं उत्तराखण्ड सरकार को उनके अपने ही जिस तरह से निशाने पर लेने का काम कर रहे हैं उस पर भाजपा हाईकमान को सख्त रूख अपनाना पडेगा नहीं तो उत्तराखण्ड में अपनी ही सरकार को कटघरे में खडा करने से गुजरात व दिल्ली में होने वाले चुनाव में भाजपा की जीत में एक बडा रोडा अटक सकता है?
उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार कोई मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली जंग लडने के लिए आगे आ रखा है और उन्होंने साफ संदेश दे रखा है कि भ्रष्टाचार करने वाला चाहे कितना भी बडा क्यों न हो उसे बक्शा नहीं जायेगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कथनी व करनी में कहीं भी अंतर दिखाई नहीं दिया जिसके चलते भ्रष्टाचारियों की नींद उडी हुई है। कुछ अर्से पूर्व जब विधानसभा में बैकडोर से हुई भर्तियों का मामला गर्माया था और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बनाई गई कमेटी ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल व भाजपा के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद के कार्यकाल में हुई भर्तियों में अनियमितता पाई गई थी तो उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने इन भर्तियों को रद्द कर दिया था। इस फैसले के बाद उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अपनी ही सरकार के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष को इन भर्तियों को लेकर कटघरे में खडा किया था और इसकी गूंज दिल्ली तक में भी गूंजी थी कि अगर भाजपा के अपने ही अगर अपनी सरकार के मंत्रियों को कटघरे में खडा करेंगे तो उससे राज्य के अन्दर क्या संदेश जायेगा? यह मामला अभी कुछ शांत हुआ ही था कि पौडी से सांसद व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने राज्य में हो रही कमीशनखोरी को लेकर एक लम्बाचौडा अध्याय पढ़ दिया जिससे उत्तराखण्ड की राजनीति में एकाएक गर्माहट आ गई कि आखिरकार ऐसा क्या हो गया था कि सांसद को कमीशनखोरी को लेकर अपने तीखे बोल बोलने पडे? हैरानी वाली बात तो यह थी कि तीरथ सिंह रावत के पास न तो कमीशनखोरी को लेकर कोई प्रमाण थे और न ही उन्होंने इस बात को उजागर किया कि आखिर किस विभाग में कमीशनखोरी का खेल चल रहा है। इससे राज्य के अन्दर एक नई बहस शुरू हो गई कि क्या राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर ंिसह धामी अपनों को ही रास नहीं आ रहे हैं? उत्तराखण्ड के भाजपा नेताओं को जहां राज्य के मुख्यमंत्री पर गर्व हो रखा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ बडी लडाई शुरू की है और उससे राज्य के अन्दर भ्रष्टाचारियों के मन एक बडा डर भी देखने को मिल रहा है लेकिन जिस तरह से तीरथ सिंह रावत ने कमीशनखोरी को लेकर अपनी बात कही उसको लेकर राज्य के अन्दर यह बहस भी शुरू हो गई है कि कहीं इस कमीशनखोरी की स्क्रीप्ट लिखने वाले कुछ और राईटर तो नहीं है?