जिद्दी बालक बोला मैं भी जाऊंगा विदेश

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सात समंदर पार जाने की जिद्द में चुलबुला
देहरादून। उत्तराखण्ड का जन्म होने के बाद से ही राज्य के अन्दर काफी चुलबुले किस्म के लोगों का चेहरा आवाम देखती रही है क्योंकि ऐसे चुलबुले एक तो खुली आंखों से सपने देखते हैं और उसके बाद वह ऐसा भोपू बजाते हैं कि उत्तराखण्ड के अन्दर उनका दबदबा है और कुछ राजनेता से लेकर अफसर उसके साथ खडे हैं। चुलबुला इतना नटखट है कि वह अपने मोबाइल फोन पर आये किसी नेता या अफसर का संदेश जब तक शहर के गली मौहल्लों में लोगों को नहीं दिखा देता तब तक वह चैन से नहीं बैठता। हैरानी वाली बात है कि अब यह जिद्दी बालक इस जिद्द पर सिस्टम के कुछ अफसरों के सामने अपना नटखटपन दिखा रहा है कि मैं भी विदेश जाऊंगा। नटखट बालक इतना भौकाली भी नहीं हुआ कि अगर वह साल समंदर पार जाने की जिद्द पर अडा हुआ है तो इस चुलबुले की जिद्द पूरी करने के लिए सिस्टम के कुछ अफसर उसे सात समंदर पार भेजने के लिए उसकी जिद्द पूरी कर दें।
उत्तराखण्ड की राजधानी इन दिनों एक ऐसे ‘चुलबुले’ किरदार की कहानियों से गुलजार है, जिसने अपनी सक्रियता, पहुंच और नटखट अंदाज के दम पर सत्ता और सिस्टम के कुछ गलियारों में ऐसी मौजूदगी दर्ज करा ली है कि अब उसकी चर्चा चाय की मेजों से लेकर सचिवालय के कमरों तक सुनाई देने लगी है। कहा जा रहा है कि यह चुलबुला जहां जाता है, वहीं अपने प्रभाव का डंका पीटने लगता है और सामने वाले को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता है कि सिस्टम की कई चाबियां अब उसके पास भी मौजूद हैं। राजधानी में चर्चा है कि इस चुलबुले ने कुछ प्रभावशाली लोगों की नजदीकियों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है। कभी किसी बड़े अधिकारी के साथ फोटो, कभी किसी प्रभावशाली नेता के साथ बैठक और कभी किसी सरकारी कार्यक्रम में उसकी मौजूदगी उसे यह विश्वास दिला चुकी है कि अब वह सत्ता के गलियारों का स्थायी किरदार बन चुका है। यही कारण है कि आजकल वह खुद को किसी सलाहकार, किसी रणनीतिकार और किसी प्रभावशाली सूत्रधार से कम नहीं समझता।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि चुलबुले की सबसे बड़ी ताकत उसका आत्मविश्वास नहीं बल्कि उसका ‘भौकाल’ है। कहा जा रहा है कि वह जहां बैठता है, वहां सिस्टम की ऐसी-ऐसी कहानियां सुनाने लगता है कि सामने वाला भी कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाए कि आखिर इस व्यक्ति की पहुंच कहां तक है। सचिवालय के गलियारों में फुसफुसाहट है कि कुछ कर्मचारियों से बढ़ी नजदीकियों के दम पर उसने कई ऐसी जानकारियां हासिल कर लीं, जिन्हें वह अपने प्रभाव का प्रमाण पत्र बनाकर पेश करता फिरता है, लेकिन इन दिनों राजधानी में जिस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह किसी फाइल, किसी नियुक्ति या किसी राजनीतिक समीकरण की नहीं, बल्कि ‘सात समंदर पार’ जाने की है। बताया जा रहा है कि चुलबुले की निगाह अब विदेश यात्रा पर टिक गई है। वह उन यात्राओं का हिस्सा बनना चाहता है, जिनमें वर्षों से मंत्री, विधायक, अधिकारी और सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोग शामिल होते रहे हैं। यही वजह है कि आजकल उसका पूरा ध्यान इसी मिशन पर लगा हुआ बताया जा रहा है।
राजधानी के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि हर दौर में ऐसे किरदार सामने आते रहे हैं जो सत्ता के आसपास घूमते-घूमते खुद को सत्ता का हिस्सा समझने लगते हैं। शुरुआत में लोग उन्हें मनोरंजन का विषय मानते हैं, लेकिन जब उनका प्रभाव बढ़ने लगता है तो फिर सवाल भी उठने लगते हैं। आखिर किसी व्यक्ति की वास्तविक भूमिका क्या है? उसकी जवाबदेही क्या है? और उसकी पहुंच की सीमा कहां तक है? चर्चाओं के अनुसार चुलबुला इन दिनों अपने करीबियों के बीच यह संदेश देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहा कि उसकी बात को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
राजधानी के गलियारों में चुलबुले की चर्चा लगातार बढ़ रही है। कोई उसे सिस्टम का नया खिलाड़ी बता रहा है, कोई उसे सत्ता की परछाईं में पनपता प्रभावशाली चेहरा मान रहा है और कोई इसे केवल भौकाल का बुलबुला बताकर हंस रहा है, लेकिन इन सब चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल वही है जो हर चाय की मेज पर सुनाई दे रहा है क्या वास्तव में किसी व्यक्ति की बढ़ती नजदीकियां उसे इतनी ताकतवर बना सकती हैं कि वह खुद को सिस्टम से ऊपर समझने लगे? क्या सत्ता के आसपास मंडराने भर से कोई सत्ता का हिस्सा बन जाता है? और क्या सरकारी संसाधनों और व्यवस्थाओं को लेकर पैदा हो रही ऐसी चर्चाएं स्वस्थ प्रशासनिक परंपराओं के लिए शुभ संकेत हैं?
फिलहाल राजधानी में यह चुलबुला चर्चा के केंद्र में है। मगर एक बात तय है कि उत्तराखण्ड की राजधानी के गलियारों में इन दिनों किसी मंत्री, किसी अफसर या किसी राजनीतिक फैसले से ज्यादा चर्चा अगर किसी की हो रही है तो वह इसी रहस्यमयी चुलबुले की हो रही है, जिसकी नजर अब सात समंदर पार के सपनों पर जा टिकी है।

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