प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का जन्म होने के बाद किसी आईपीएस में राज्य की जनता ने शेर देखा तो कुछ आईपीएस अफसरों को राजनेताओं की गुलामी करते हुए देखा गया जिन्होंने कुर्सी पर बने रहने के लिए वर्दी को राजनेताओं के सामने शर्मशार किया और उनकी गुलामियत मंजूर करते हुए उनके इशारे पर उनके विरोधियों के खिलाफ कुछ भी कर गुजरने का हर समय आगे खडे हुये दिखाई दिये उसी का परिणाम है कि आज उत्तराखण्ड में राज्य की जनता पुलिस पर वो भरोसा करने को तैयार नहीं है जिस भरोसे को कायम करने के लिए पुलिस के कुछ अफसर रात-दिन आवाम को संदेश देते आ रहे हैं? उत्तराखण्ड के अन्दर चंद आईपीएस अफसर ऐसे भी दिखाई दिये जिन्होंने भ्रष्टाचार की सारी सीमायें तोडी और उन पर थाने-चौकियां बेचने के साथ ही जमीनों के धंधे में खुलकर तांडव दिखाने का भी दाग लगा। उत्तराखण्ड के अन्दर कुछ आईपीएस अफसरों का रूप आवाम को आज भी रास नहीं आ रहा है और उसी का परिणाम है कि भले ही यह दावा किया जाता हो कि राज्य की पुलिस मित्र पुलिस है लेकिन आवाम कुछ अफसरों के इस दावे को सच मानने को आज भी तैयार नहीं है?
उत्तराखण्ड का जब जन्म हुआ था तो राज्य की जनता ने एक आईपीएस को जुनून से नौकरी करते हुए देखा था क्योंकि उस आईपीएस के मन में एक ही सोच थी कि उन्होंने आईपीएस की जो वर्दी पहनी है वह पैसे कमाने के लिए नहीं बल्कि आवाम की रक्षा करने के लिए पहनी है और यही कारण है कि इस आईपीएस ने अपने जुनून से जब बडे-बडे अपराधियों को मिट्टी में मिला दिया तो उन्हें वर्दी का शेर कहा गया और वर्दी का यह शेर अपराधियों को यह दिखाता था कि पुलिस उसे पाताल से भी खोज निकालेगी अगर उसने कोई अपराध करने का दुसाहस किया। इस शेर आईपीएस के किस्से आज भी राज्य के गलियारों में लोग चाय की दुकान से लेकर रेस्तरा तक में एक दूसरे को सुनाते हुए नजर आते हैं। एक बार की बात है कि एक कुख्यात गैंग ने शेर आईपीएस को ललकारा और वह पुलिस की आंखों से गायब हो गया तो उस आईपीएस की नींद उड गई और उन्होंने अपनी टीम के सामने का गुस्से का जो इजहार किया उसे देखकर उनकी टीम भी थरथर कांप गई थी और वह टीम तब तक जनपद में नहीं घुसी जब तक शेर आईपीएस को ललकारने वाले गैंग के कुख्यात को सबक नहीं सिखा दिया गया। उत्तराखण्ड के अन्दर इस आईपीएस को इसलिए भी शेर माना जाता है कि उन्होंने कभी भी न तो किसी राजनेता और न ही किसी ऊंची पहुंच वाले के गलत आदेश को मानने के लिए हामी भरी। इस शेर आईपीएस के किस्से आज भी उत्तराखण्ड में एक फिल्मी आईपीएस की तरह ही सुने जाते हैं। वहीं राज्य के अन्दर कुछ आईपीएस अफसर सफेदपोशों और चंद राजनेताओं के गुलाम बनकर कुर्सी हासिल करने का खेल खेलते रहे? हैरानी वाली बात है कि कुर्सी पाने के लिए कुछ आईपीएस अफसरों ने अपनी वर्दी की सारी गरिमा को ही तार-तार कर दिया और उसे देखकर आवाम के मन में यह अफसोस होता था कि अगर उन्होंने अलग राज्य की कल्पना की थी तो उन्हें इस बात का तिनकाभर भी अहसास नहीं था कि जिस राज्य को पाने के लिए उनके अपने हमेशा के लिए शहीद हो गये उनके सपनों के राज्य में भी कुछ आईपीएस अफसर कुछ राजनेताओं और सफेदपोशों की गुलामी कर उनके इशारे पर वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जायेंगे? उत्तराखण्ड की जनता ने कुछ गुलाम आईपीएस भी देखे जिन्होंने सिर्फ कुर्सी पर बने रहने के लिए अपने कंधे पर लगे स्टारों की भी शोभा को धूमिल कर दिया था? वहीं उत्तराखण्ड के अन्दर बाइस सालों में कुछ आईपीएस अफसर ऐसे भी देखने केा मिले जिन्होंने भ्रष्टाचार की सारी सीमायें लांध दी और वह थाने चौकियों तक की नीलामी करने से भी कभी पीछे नहीं हटे और उन्होंने भ्रष्टाचार का जो खुला तांडव किया उसे भी राज्य की जनता आज तक याद करती है? उत्तराखण्ड के अन्दर आवाम के मन में पुलिस को लेकर जो एक विश्वास शुरूआती दौर में देखने को मिला था वह विश्वास धीरे-धीरे कुछ आईपीएस अफसरों के कारण टूटता चला गया? ऐसे में कहा जा सकता है कि जहां उत्तराखण्ड के अन्दर आईपीएस में वर्दी का शेर दिखा तो वहीं कुछ राजनेताओं के गुलाम और भ्रष्टाचारी भी देखने को मिले जिसके चलते अब आवाम के मन में एक आशा की किरण है कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो 2०25 तक राज्य को आदर्श राज्य बनाने की दिशा में आगे बढ रहे हैं वह राज्य की समूची पुलिस को जरूर मित्र पुलिस बना देंगे?