शतरंजी बिसात की निकल गई ‘हवाÓ

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में पिछले कुछ दिनों से उत्तराखण्ड की राजनीति में शतरंजी बिसात बिछने की खबरें हवा में तैर रही थी और कुछ हवाबाज अपनी-अपनी तरह से देहरादून से लेकर दिल्ली तक की बातें कर तूफान पैदा करने का चक्रव्यूह रचकर खूब हवाबाजी कर रहे थे लेकिन अब खबर है कि इस हवाबाजी की हवा निकल गई है। राजनीति की शतरंज के माहिर मुख्य खिलाडी ने अपने मोहरे इतनी चतुराई से चले कि उनके घोडे ने ढाई चाल चल कहां-कहां मार कर दी, ऊंट किस करवट बैठ गया और वजीर ने कैसे घमाशान मचा दिया हवाबाजों को इसका इल्म भी नहीं हो सका और अब यह हवाबाज राज्य के अन्दर चारो खाने चित नजर आ रहे हैं तथा वह यह सोचने को मजबूर हो गये हैं कि आखिर उनकी शतरंजी बिसात कैसे फेल हो गई।
उत्तराखण्ड में बाइस सालों से सियासत में हमेशा भूचाल मचता हुआ दिखाई देता रहा है और हमेशा यह बहस चलती रही कि आखिर कुछ हवाबाज राज्य के अन्दर सियासत में क्यों तूफान लाने का चक्रव्यूह रचकर उत्तराखण्ड में हलचल पैदा करने का खेल खेलते हैं। उत्तराखण्ड के अन्दर सबकुछ अच्छा चल रहा है लेकिन कुछ चेहरे ऐसे हैं जिन्हें राज्य में दिख रहा खुशहाली का उजाला रास नहीं आ रहा है और यही कारण है कि वह शतरंजी बिसात बिछाकर राज्य के अन्दर ऐसी हवाबाजी फैलाने का खेल खेलने में जुटे रहे जिससे राज्य का तापमान एकाएक गर्माहट में दिखाई दे। शतरंजी बिसात बिछाने वाले कुछ चेहरे भले ही अपने आपको शतरंज का बादशाह समझ रहे हों और वह यह भ्रम पालकर बैठ गये हों कि राजनीति की शतरंजी बिसात में वह बडे वजीर को अपनी चाल से बाहर कर देंगे लेकिन इन हवाबाजों को इस बात का इल्म नहीं था कि जिस वजीर को शतरंजी बिसात में वह कमजोर मानकर उन्हें अपनी चालों में घेरने का खेल खेल रहे थे उस वजीर ने आखिरकार शतरंजी बिसात के मुख्य खिलाडी को अपनी चतुराई से घोडे की ढाई चाल ऐसी चली कि मुख्य खिलाडी वजीर की एक ही चाल से हार गया और जो हवाबाज राज्य के अन्दर सियासत में तूफान लाने का चक्रव्यूह रच रहे थे उन हवाबाजों को वजीर की वो चाल ही समझ नहीं आई जो उन्होंने आखिरी समय में चली? उत्तराखण्ड में वाहियात बयानबाजियों को सुनकर 1980 में आई हिन्दी फिल्म बुलंदी का वह डॉयलॉग आज राज्य में जरूर गूंज रहा होगा जिसमें कहा गया था कि ”तुमने सुना होगा तेजा कि जब सिर पर बूरे दिन मंडराते हैं तो जबान लम्बी हो जाती हैÓÓ।

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